डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
गिरना भी भाँति-भाँति का होता है।
चलते-चलते गिर जाना
किसी से टकराकर गिर जाना।
नैतिकता के आँचल से गिर जाना।
और तो और अपनो की नजरों से गिर जाना।
लेकिन सबसे निकृष्ट है
अपनी नजरों मे गिर जाना।
अपनी नजरों मे गिरा हुआ आदमी,
मुर्दा होता है।
वह खाता-पीता-बोलता तो है,
लेकिन भीतर से जल रहा होता है।
रात सबकी काली है
ये संसार का नियम है।
दिन भी काले हो जाएँ
ये अपने-अपने कर्म हैं।
हाँ कभी-कभी रात को दिन
और दिन को रात
बना दिया जाता है।
इसके पीछे सदैव कोई
अपना होता है,
वो कभी अन्धेरे को
कभी आपको खाता है।
यही जीवन-चक्र है
जहाँ पिछला और पूरा
हिसाब होता है।
इंसान वही काटता है
जो उसने पूर्व मे बोया होता है।
हाँ! कभी-कभी भावनाएँ
परिवर्तन लाती हैं।
किसी को हँसाती हैं
और किसी को रुलाती हैं।
अपनो का भ्रम और शर्म
दोनो छूट जाते हैं।
जब जीवन मे
सबसे बुरे दिन आते हैं।