रामायण : रावण-निर्मित भय का उन्मूलन

रावण को किसी ने देखा नहीं था—
फिर भी सबने उसे देखा हुआ मान लिया था।

किष्किंधा से दक्षिण की ओर बढ़ते वानर-दल के पाँव दृढ़ थे,
पर मन अनिश्चित।

वन बदलते जा रहे थे।
वृक्ष ऊँचे, छाया गहरी,
और कथाएँ—और भी घनी।

“कहते हैं रावण की आँखों में अग्नि जलती है।”
“कहते हैं वह युद्ध से पहले ही शत्रु का मन तोड़ देता है।”
“कहते हैं उसकी लंका स्वयं युद्ध करती है।”

ये वाक्य कोई आदेश नहीं थे,
पर प्रभाव किसी शाप से कम नहीं।

हनुमान सुनते थे—बोलते नहीं थे।
वे जानते थे,
भय को दबाया नहीं जाता,
उसे समझा जाता है।

एक स्थान पर एक युवा वानर रुक गया।
उसके हाथ काँप रहे थे।

“मैंने सुना है…”
उसने कहना चाहा,
पर वाक्य पूरा न कर सका।

जाम्बवान ने उसकी ओर देखा।

“तूने सुना है,”
वे बोले,
“पर क्या तूने देखा है?”

वानर चुप रहा।

“यही अंतर है,”
जाम्बवान ने कहा,
“कथा और सत्य का।”

पर वे भी जानते थे—
कथा को तोड़ना सरल नहीं।

क्योंकि रावण का भय उसकी तलवार से नहीं,
उसके नाम से उपजा था।


वे समुद्र के सामने खड़े थे।

असीम।
अथाह।
निःशब्द—और फिर भी गर्जन करता हुआ।

कई वानरों ने जीवन में पहली बार
इतना जल देखा था।

कुछ पीछे हट गए।
कुछ बैठ गए।

समुद्र केवल भौगोलिक बाधा नहीं था—
वह अंतिम भय था।

“इसके पार…”
एक वानर ने कहा,
“रावण है।”

अब नाम लिया गया।
और नाम के साथ ही
मन में कंपन हुआ।

हनुमान आगे आए।
उन्होंने समुद्र की ओर देखा,
फिर वानरों की ओर।

वे कुछ कह सकते थे—
उन्हें ज्ञात था कि रावण ही अपराधी है।
उन्हें यह भी ज्ञात था कि लंका वहीं है।

पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।

क्योंकि सत्य,
यदि भय से भारी हो,
तो बोझ बन जाता है।

जाम्बवान आगे बढ़े।

“तुम सबने समुद्र देखा है,”
उन्होंने कहा,
“पर स्वयं को नहीं देखा।”

उनकी आवाज़ में स्मृति थी।

“एक समय था
जब यह समुद्र भी छोटा लगता था।”

हनुमान चौंके।

जाम्बवान की दृष्टि हनुमान पर ठहर गई।

“कभी-कभी,”
उन्होंने कहा,
“किसी एक को
स्मरण दिलाना पड़ता है
कि वह कौन है।”

हनुमान ने आँखें मूँद लीं।


वह रात शांत थी।

समुद्र की लहरें
मानो किसी निर्णय की प्रतीक्षा कर रही थीं।

हनुमान अकेले बैठे थे।

उनके भीतर दो स्वर थे—

एक कहता था:
“तू जा सकता है।”

दूसरा पूछता था:
“पर क्यों?”

तभी उन्हें राम की वह दृष्टि स्मरण आई—
जिसमें आदेश नहीं था,
विश्वास था।

यह यात्रा केवल सीता की नहीं थी।
यह यात्रा इस प्रश्न की थी—

क्या भय को देखा जा सकता है और फिर भी आगे बढ़ा जा सकता है?

हनुमान उठे।

उन्होंने वानरों की ओर देखा—
साधारण, भयभीत,
पर आशा से भरे।

“यदि मैं नहीं गया,”
हनुमान ने स्वयं से कहा,
“तो वे कभी नहीं जाएँगे।”

उन्होंने समुद्र की ओर कदम बढ़ाया।

“यह छलाँग मेरे बल की नहीं,”
वे बोले,
“यह उनके विश्वास की है।”

और फिर—

पृथ्वी छूटी।
आकाश मिला।

हनुमान उड़ रहे थे।

पर सच यह था—
उस क्षण
पूरा वानर समाज
उनके साथ उड़ रहा था।