डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
सबसे पहले ब्राह्मण को पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है। यह कथन किसी वर्गविशेष के अपमान या सामाजिक विद्वेष से प्रेरित नहीं, अपितु धर्म-संरक्षण और सामाजिक सुचिता की गम्भीर चेतावनी है। जिस प्रकार समाज में स्वच्छता केवल बाह्य सफाई से सम्भव नहीं, जब तक व्यक्ति स्वयं अपने घर को शुद्ध न करे—उसी प्रकार धर्मक्षेत्र में भी सुधार तब तक सम्भव नहीं, जब तक उसके संरक्षक माने जाने वाले वर्ग का आत्मावलोकन न हो।
धर्मशास्त्रों में यह बात अत्यन्त स्पष्ट है कि धर्म का भार वही उठा सकता है, जो स्वयं धर्म में स्थित हो—
धर्मो धारयति लोकान्
धर्मो धारयते प्रजाः।
(मनुस्मृति 8.15)
धर्म समाज को धारण करता है, परन्तु धर्म स्वयं धारक पर आश्रित है। यदि धारक ही दुर्बल, पथच्युत और स्वार्थग्रस्त हो जाए, तो धर्म का ढाँचा खोखला हो जाता है।
वेद, उपनिषद् और स्मृतियाँ एक स्वर में कहती हैं कि ब्राह्मण कोई जन्मसिद्ध पदवी नहीं, बल्कि एक कठिन साधना-पथ है। ऋग्वेद कहता है—
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्
(ऋग्वेद 10.90.12)
यहाँ मुख का अर्थ है—वाणी, विवेक और ज्ञान की जिम्मेदारी। मुख भोजन करता है, पर उससे पहले वह बोलता है, निर्देश देता है और संयम रखता है। अतः ब्राह्मण का स्थान श्रेष्ठ इसलिए नहीं कि वह ऊपर बैठा है, बल्कि इसलिए कि उस पर सबसे कठोर अनुशासन लागू होता है।
उपनिषद् में ब्राह्मण की पहचान स्पष्ट की गई है—
सत्यं वद। धर्मं चर।
स्वाध्यायान्मा प्रमदः।
(तैत्तिरीयोपनिषद् 1.11)
यह उपदेश विशेष रूप से ब्राह्मण जीवन के लिए है। सत्य, धर्म और स्वाध्याय—इनसे विचलन का अर्थ है ब्राह्मणत्व का पतन।
मनु महाराज इस विषय में अत्यन्त कठोर हैं। वे स्पष्ट कहते हैं—
शूद्रो ब्राह्मणतां याति
ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।
(मनुस्मृति 10.65)
अर्थात् कर्म और आचरण से शूद्र ब्राह्मणत्व को प्राप्त हो सकता है और ब्राह्मण अपने पतन से शूद्रत्व को। मनु का यह कथन आज के समय में अत्यन्त असुविधाजनक लगता है, परन्तु यही धर्म का सत्य है।
मनु आगे कहते हैं—
न जात्या ब्राह्मणो भवेत्
न वेदैर्न तपसा न च।
यो धर्मं आचरत्येव
स ब्राह्मण इति स्मृतः॥
अर्थात् न जन्म से, न केवल वेद-पाठ से, न तप से—जो धर्म का आचरण करता है, वही ब्राह्मण है।
यही कारण है कि मनु यह भी कहते हैं कि—
पथभ्रष्टो द्विजः श्वा इव त्याज्यः।
अर्थात् पथ से भ्रष्ट ब्राह्मण चाण्डाल से भी अधिक पतित है, क्योंकि चाण्डाल से समाज को अपेक्षा नहीं होती, परन्तु ब्राह्मण से होती है।
आज मनुस्मृति को प्रायः बिना पढ़े, बिना सन्दर्भ समझे, जातिवाद का ग्रन्थ कहकर त्याज्य ठहरा दिया जाता है। जबकि उसका दसवाँ अध्याय स्पष्ट करता है कि जातियाँ वर्णों के विचलन और मिश्रण से उत्पन्न हुई हैं—
वर्णानां संकराद् जातयः।
(मनुस्मृति 10.5)
यह अध्याय कोई सामाजिक गर्व नहीं, बल्कि सामाजिक पतन का शास्त्रीय दस्तावेज है।
मनु यह भी स्वीकार करते हैं कि—
ब्राह्मणानां बहवः शूद्राः।
(मनुस्मृति 2.103 — भावार्थ)
अर्थात् अधिकांश ब्राह्मण अपने आचरण से शूद्रत्व को प्राप्त हो चुके हैं। यह कथन किसी अपमान के लिए नहीं, बल्कि आत्मसुधार की चेतावनी है।
भगवद्गीता इस विषय को अत्यन्त सन्तुलित ढंग से प्रस्तुत करती है—
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं
गुणकर्मविभागशः।
(गीता 4.13)
यहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वर्ण का आधार गुण और कर्म है, न कि जन्म।
ब्राह्मण के गुण गीता में बताए गए हैं—
शमो दमस्तपः शौचं
क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं
ब्राह्मकर्म स्वभावजम्॥
(भगवद्गीता 8.42)
आज यदि कोई स्वयं से पूछे— क्या ब्राह्मण समाज में शम, दम, तप, शौच, ज्ञान और आस्तिक्य शेष है? यदि नहीं, तो पुनर्मूल्यांकन अनिवार्य है।
वैदिक संस्कृति कोई जड़ संरचना नहीं, बल्कि प्रवहमान सरिता है—
धर्मं यद् धारणस्य।
जो धारण करे वही धर्म है। यदि कोई परम्परा समाज को तोड़ने लगे, अधर्म को ढकने लगे, तो उसका पुनर्पाठ आवश्यक है।
श्रीकृष्ण का घोष—
सर्वधर्मान् परित्यज्य
मामेकं शरणं व्रज।
(भगवद्गीता 18.66)
यह श्लोक धर्मत्याग नहीं, बल्कि धर्म के विकृत रूपों का परित्याग है। जो धर्म करुणा, सत्य और विवेक से रहित हो—वह धर्म नहीं, आवरण है।
यह भी सत्य है कि—
यावत् ब्राह्मणः पूज्यः
तावत् लोकः प्रतिष्ठितः।
अर्थात् जब तक धर्मज्ञ, चरित्रवान ब्राह्मण का सम्मान है, तब तक समाज सुरक्षित है। परन्तु अधर्मी ब्राह्मण का सम्मान समाज के लिए विष है।
ध्यान रहे कि धर्मज्ञ ब्राह्मण समाज की रीढ़ है और पथच्युत ब्राह्मण समाज का सबसे बड़ा खतरा। दोनों को एक तराजू में रखना ही अधर्म है।
यह लेख ब्राह्मण-विरोध नहीं, बल्कि ब्राह्मणोचित आत्मसंशोधन का आह्वान है। जब तक धर्म का ध्वजवाहक स्वयं शुद्ध नहीं होगा, तब तक समाज में नैतिकता की अपेक्षा व्यर्थ है।
उपनिषद् की पुकार आज भी उतनी ही प्रासंगिक है—
उत्तिष्ठत जाग्रत
प्राप्य वरान्निबोधत।
(कठोपनिषद् 1.3.14)
उठो, जागो और सत्य को जानो।