साहित्य किसी की भी ‘सम्पदा’ नहीं

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

साहित्य सभी के लिए है। साहित्य के साथ दलित-पतित, अगड़ा-पिछड़ा लगाकर साहित्य को कतिपय लोग एक खाँचे तक सीमित रखना चाहते हैं। अरे! साहित्य को ‘साहित्य’ ही रहने दो, उसका ‘बीभत्स’ राजनीतीकरण मत करो। वैसे भी जनवाद, प्रगतिवाद इत्यादिक वादों में साहित्य को ढालकर गर्हित कृत्य किया जा चुका है।

कथित दलित-वर्ग आज तक इन प्रश्नों पर एकमत नहीं है :— ‘दलित’ किसे कहा जाये? दलित-लेखन का उद्देश्य, कथ्य, तथ्य, तर्क तथा निष्कर्ष किस प्रकार का होना चाहिए? क्या दलित-समाज के किसी व्यक्ति-द्वारा कथित दलित-समाज पर आधृत लेखन ही ‘दलित-साहित्य’ कहलायेगा अथवा कथित दलित-समाज के किसी रचनाकार-द्वारा सम्पूर्ण समाज के दलित लोग का चरित्र-चिन्तन-लेखन दलित-साहित्य की श्रेणी के अन्तर्गत आयेगा अथवा समाज के किसी भी दलित रचनाधर्मी का कथित दलित-समाज पर ही आधृत लेखन दलित- साहित्य है अथवा किसी भी रचनाधर्मी-द्वारा समग्र समाज के वंचित-शोषित-दमितजन की आकांक्षाओं की समग्र अभिव्यक्ति उक्त ‘दलित-साहित्य’ के अन्तर्गत रेखांकित होगी? ‘दलित-साहित्य’ का नाम देनेवाले क्या साहित्य की समष्टिगत मूल अवधारणा के साथ क्रूर छल नहीं कर रहे हैं? महाकाव्य-काल में अघोषित ‘दलित-साहित्य’ की ‘दलित-साहित्य’ के नाम से रचना क्यों नहीं की गयी थी?

साहित्य किसी भी धर्म, जाति, वर्गादिक की सम्पदा नहीं है। निस्सन्देह, साहित्य में ‘जातीयता’ रही है; किन्तु उसका बीभत्स और एकांगी रूप कभी नहीं रहा है। वाल्मीकि, रैदास, शबरी, जटायु, निषादराज इत्यादिक के चरित्र समाज के सम्मुख उदात्त प्रतिमान प्रस्तुत करते आ रहे हैं।

दशकों से जिन गतिविधियों के साथ जिस स्वर में ‘दलित-साहित्य’ की आराधना की जा रही है, वह निस्सन्देह, एक शोचनीय विषय है। हाँ, समाज के प्रत्येक जाति-वर्ग में एक ऐसा विन्दु अवश्य है, जो समृद्धि-केन्द्र से असम्पृक्त परिलक्षित होता रहा है; परन्तु वह ‘दलित’ नहीं, प्रत्युत ‘सर्वहारा’ है। कितना श्रेयस्कर रहता, यदि ‘दलित-चिन्तन’ की संकीर्णता से परे रहकर ‘सर्वहारा-चिन्तन’ की नीवँ (‘नींव’ अशुद्ध शब्द है।) डाली जाती!

हमें इन सबके उत्तर चाहिए। तर्कसंगत सकारात्मक उत्तर की अपेक्षा है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज ; ६ नवम्बर, २०२० ईसवी।)