डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
चेतना का प्रसार जितना शांत दिखाई देता है, उसका प्रभाव उतना ही व्यापक होता है। गाँवों में उभर रही नई पद्धति—जहाँ निर्णय सामूहिक होते थे, जहाँ न्याय करुणा के साथ संतुलित होता था, और जहाँ नेतृत्व व्यक्ति नहीं, सिद्धान्त होता था—धीरे-धीरे एक वैचारिक धारा का रूप लेने लगी।
किन्तु जहाँ परिवर्तन होता है, वहाँ प्रतिरोध भी जन्म लेता है।
एक प्रातः तीन घुड़सवार गाँव में प्रवेश करते दिखाई दिए। उनके साथ दो कर्मचारी थे, जिनके हाथों में अभिलेखों की पोटली थी। वे राज्य-प्रशासन के प्रतिनिधि थे। उनके आने का उद्देश्य स्पष्ट था—यह जानना कि यहाँ की व्यवस्था किस प्रकार चल रही है और क्या यह पारंपरिक शासन-पद्धति के अनुकूल है।
गाँव के लोगों ने उनका स्वागत किया। उन्हें वटवृक्ष के नीचे बैठाया गया। जल और अन्न प्रदान किया गया। सब कुछ मर्यादा के अनुसार हुआ, पर वातावरण में एक सूक्ष्म तनाव था।
मुख्य अधिकारी, जिसका नाम सोमदत्त था, ने चारों ओर दृष्टि डाली और कहा—
“हमें ज्ञात हुआ है कि यहाँ निर्णय किसी नियुक्त मुखिया या पंचायत प्रमुख द्वारा नहीं लिए जाते। क्या यह सत्य है?”
वृद्ध ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“यहाँ मुखिया है, पर वह कोई एक व्यक्ति नहीं। हम सब मिलकर निर्णय लेते हैं।”
सोमदत्त ने अपनी पोटली खोली और एक पत्र निकाला—
“राज्य की व्यवस्था में प्रत्येक ग्राम का एक उत्तरदायी प्रतिनिधि होना आवश्यक है। यदि कोई विवाद उत्पन्न हो या कर-संग्रह का प्रश्न हो, तो उत्तरदायित्व उसी पर होता है। सामूहिक निर्णय की पद्धति उत्तरदायित्व को अस्पष्ट कर देती है।”
सभा में कुछ क्षण मौन रहा। यह केवल प्रशासनिक प्रश्न नहीं था; यह व्यवस्था और चेतना का प्रश्न था।
एक युवक ने कहा—
“हम उत्तरदायित्व से नहीं बचते। हम उसे बाँटते हैं। यदि कोई निर्णय गलत होता है, तो उसका भार भी हम सब पर होता है।”
सोमदत्त ने तीखे स्वर में कहा—
“पर राज्य को एक नाम चाहिए, एक व्यक्ति चाहिए।”
वृद्ध ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—
“राज्य को नाम चाहिए, समाज को संतुलन।”
अधिकारी ने गाँव में तीन दिन रहने का निश्चय किया ताकि वह व्यवस्था को निकट से देख सके। इन तीन दिनों में उसने देखा कि यहाँ अनुशासन है, पर भय नहीं। लोग समय पर कार्य करते हैं, पर दंड के कारण नहीं, बल्कि सहभागिता के कारण।
यह उसके लिए नया अनुभव था, पर उसके मन में संशय बना रहा—
“यदि यह पद्धति फैल गई, तो पारंपरिक सत्ता का स्वरूप बदल जाएगा,” उसने अपने सहकर्मी से कहा।
सहकर्मी ने उत्तर दिया—
“पर यदि इससे समाज में शांति बढ़ती है, तो क्या यह बुरा है?”
सोमदत्त ने कहा—
“प्रश्न यह नहीं कि यह अच्छा है या बुरा। प्रश्न यह है कि व्यवस्था स्थिर रहेगी या नहीं।”
यह वही शाश्वत प्रश्न था— क्या व्यवस्था भय से टिकती है या विश्वास से?
इसी बीच एक गंभीर विवाद उत्पन्न हुआ। दो पड़ोसी गाँवों के बीच जल-स्रोत के अधिकार को लेकर तनाव बढ़ गया। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क लेकर वटवृक्ष के नीचे आए। यह केवल जल का प्रश्न नहीं था; यह प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका था।
सोमदत्त ने सोचा—
“अब देखेंगे कि यह सामूहिक पद्धति कैसे निर्णय लेती है।”
सभा आरम्भ हुई। दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी बात रखी। आवाज़ें ऊँची भी हुईं, पर किसी ने किसी को रोका नहीं। सभी को पूरा बोलने दिया गया। फिर प्रश्नों का क्रम आरम्भ हुआ—
जल की वास्तविक आवश्यकता किसे अधिक है?
किसके पास वैकल्पिक स्रोत हैं?
क्या कोई साझा योजना बनाई जा सकती है?
बहुत देर तक चर्चा चली। अंततः यह प्रस्ताव रखा गया कि जल का उपयोग समयानुसार विभाजित किया जाए और दोनों गाँव मिलकर एक नया जल-संग्रहण स्थल बनाएँ ताकि भविष्य में विवाद न हो।
दोनों पक्षों ने पहले संकोच किया, पर जब उन्हें श्रम और लाभ दोनों के साझे होने का आश्वासन मिला, तो सहमति बन गई।
सोमदत्त यह देखकर आश्चर्यचकित था। उसने सोचा था कि बिना अधिकार के निर्णय असंभव होगा, पर यहाँ निर्णय केवल हुआ ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक समाधान के साथ हुआ।
तीसरे दिन प्रस्थान से पहले सोमदत्त ने सभा को संबोधित किया—
“मैं अभी भी मानता हूँ कि राज्य-व्यवस्था के लिए एक उत्तरदायी व्यक्ति आवश्यक है। पर मैं यह भी स्वीकार करता हूँ कि यहाँ जो पद्धति विकसित हुई है, वह समाज को स्थिर और शांत बना रही है।”
उसने आगे कहा—
“यदि तुम लोग एक प्रतिनिधि चुन लो जो राज्य से संवाद का माध्यम बने, और भीतर सामूहिक निर्णय की पद्धति बनाए रखो, तो दोनों का संतुलन संभव है।”
यह प्रस्ताव एक सेतु था—
सत्ता और चेतना के बीच।
सभा ने विचार किया और सहमति दी। उन्होंने एक प्रतिनिधि चुना—पर यह स्पष्ट किया कि वह निर्णयकर्ता नहीं, केवल संवादकर्ता होगा।
सोमदत्त ने जाते समय वृद्ध से कहा—
“तुम लोगों ने मुझे सिखाया कि व्यवस्था केवल आदेश से नहीं, सहभागिता से भी चल सकती है।”
वृद्ध ने उत्तर दिया—
“और आपने हमें सिखाया कि व्यापक संरचना से संवाद भी आवश्यक है। समन्वय ही संतुलन है।”
उस दिन के बाद गाँव में एक नई समझ विकसित हुई—
परिवर्तन परम्परा का विरोध नहीं, उसका विस्तार हो सकता है।
सत्ता और चेतना विरोधी नहीं, पूरक हो सकते हैं।
यही शिव का ताण्डव है—
जहाँ संहार का अर्थ विनाश नहीं, रूपान्तरण होता है।
जहाँ नई सृष्टि पुरानी की राख पर नहीं, उसके सार पर खड़ी होती है।
वटवृक्ष की छाया में बैठा एक बालक आकाश की ओर देख रहा था। उसने धीरे से कहा—
“शिव का नृत्य रुकता नहीं, बस रूप बदलता है।”
वृद्ध ने उसकी ओर देखा और कहा—
“जब समाज संतुलन सीख लेता है, तब वही नृत्य जीवन बन जाता है।”