रावण के आतंक का अन्त

हनुमानजी ने लंका को पहली बार देखा तो ठिठक गए।

यह वैसी नहीं थी जैसी कथाओं में कही गई थी।
यह केवल भय की नगरी नहीं थी—
यह वैभव की नगरी थी।

स्वर्ण-प्रासाद, सुगंधित उपवन,
रत्नों से जड़े द्वार,
और प्रहरी—
जो निडर नहीं, बल्कि लापरवाह थे।

हनुमान समझ गए—
जहाँ भय का शासन होता है,
वहाँ पहरे भी आदत बन जाते हैं।

वे लघु रूप में लंका में प्रविष्ट हुए।
नगर सो रहा था—
पर यह निद्रा शांति की नहीं थी,
यह अति-आत्मविश्वास की निद्रा थी।

राक्षस मदिरा में डूबे थे।
उनकी हँसी में क्रूरता थी,
पर आँखों में सजगता नहीं।

हनुमान एक छत से दूसरी छत पर बढ़ते गए।

“यह लंका अजेय नहीं है,”
उन्होंने मन ही मन कहा,
“यह केवल अछूती रही है।”

अशोक वाटिका पहुँचे तो
वातावरण बदल गया।

वहाँ वैभव नहीं था—
वहाँ धैर्य था।

सीता भूमि पर बैठी थीं।
उनके चारों ओर राक्षसियाँ थीं,
पर उनके भीतर भय नहीं था।

हनुमान ने सिर झुका दिया।

अब उन्हें केवल सीता नहीं मिली थीं—
उन्हें यह भी मिल गया था
कि भय को पराजित किया जा सकता है।

लंका में पहली बार
किसी ने खुलकर हँसी उड़ाई।

वह हँसी अक्षय कुमार की थी—
रावण के प्रिय पुत्र की।

“एक वानर?”
उसने कहा,
“इतना उपद्रव केवल एक वानर?”

अक्षय कुमार के लिए
यह युद्ध नहीं था,
यह मनोरंजन था।

उसने सेना भेजी—
मानो मक्खी मारने जा रहा हो।

हनुमान ने प्रतीक्षा की।

पहला प्रहार—
राक्षस गिरा।

दूसरा—
और गिरा।

हँसी रुक गई।

अब अक्षय स्वयं आगे बढ़ा।

उसकी शक्ति वास्तविक थी।
उसका अहंकार भी।

पर उसने एक भूल की—
उसने हनुमान को केवल वानर समझा।

युद्ध संक्षिप्त था।
पर उसका प्रभाव दीर्घकालिक।

अक्षय कुमार गिर पड़ा।

लंका में पहली बार
रावण का रक्त
धरती पर गिरा।

और धरती ने उसे स्वीकार कर लिया।

नगर में फुसफुसाहट फैल गई—

“रावण का पुत्र…
मारा गया?”

यह केवल एक मृत्यु नहीं थी।
यह मिथक में पहली दरार थी।

हनुमान भाग सकते थे।

पूरा नगर उनके लिए खुला था।
पर उन्होंने भागना नहीं चुना।

वे जानबूझकर
नागपाश में बँधे।

राक्षस चकित थे।

“यह कैसा शत्रु है
जो स्वयं को पकड़वाता है?”

हनुमान मुस्कुराए।

सभा में उन्हें लाया गया।

रावण सिंहासन पर बैठा था—
दशानन, महाबली,
जिसके नाम से संसार काँपता था।

“तू कौन है?”
रावण ने पूछा।

“दूत,”
हनुमान बोले।

सभा हँस पड़ी।

“दूत?”
रावण ने कहा,
“और वह भी अकेला?”

हनुमान ने शांत स्वर में कहा—

“भय अकेला ही आता है,
पर विश्वास सेना लेकर आता है।”

रावण क्रुद्ध हुआ।

उसने आदेश दिया—
पूँछ में आग लगाई जाए।

सभा को लगा—
अब भय लौट आएगा।

पर हुआ उल्टा।

हनुमान की आँखों में भय नहीं था।

रावण पहली बार
असहज हुआ।


आग जली।

पर वह पूँछ से आगे बढ़ती चली गई।

हनुमान कूदे।

एक छत जली।
फिर दूसरी।

लोग भागे।

राक्षस चिल्लाए।

लंका, जो कभी अजेय थी,
अब धधक रही थी।

यह केवल नगर का दहन नहीं था—
यह उस विश्वास का दहन था
कि रावण को छुआ नहीं जा सकता।

हनुमान जहाँ-जहाँ गए,
वहीं यह संदेश पहुँचा—

“रावण भी डरता है।”
“रावण भी असुरक्षित है।”

रावण महल से बाहर आया।

उसने ज्वाला देखी।

पर वह ज्वाला नगर में नहीं थी—
वह लोगों के मन में थी।

हनुमान समुद्र की ओर लौटे।

पीछे लंका जल रही थी।

पर सबसे बड़ा परिवर्तन
अदृश्य था—

अब कथा बदल चुकी थी।

अब यह नहीं कहा जाएगा कि
“रावण अजेय है।”

अब कहा जाएगा—

“रावण से लड़ा जा सकता है।”