भारतीय परम्परा के आधुनिक नैतिकता से अधिक वैज्ञानिक होने का प्रमाण : नियोग
भारतीय वैदिक परंपरा को लेकर आज एक सामान्य प्रवृत्ति दिखाई देती है कि हम उसे या तो आँख मूँदकर पूजते हैं या फिर थोथी नैतिकता के नाम पर सिरे से खारिज कर देते हैं। इन दोनों मानसिकताओं के बीच जो तथ्य सबसे अधिक गलत समझा गया वह है; नियोग। नियोग का नाम आते ही आज के पाठक के मन में अनेक शंकाएँ, असहजता और नैतिक आपत्तियाँ उठती हैं। प्रायः इसे स्त्री-विरोधी, अनैतिक या तांत्रिक प्रक्रिया मान लिया जाता है। किंतु यदि हम थोड़ी देर के लिए आधुनिक पूर्वाग्रहों को एक ओर रखकर शास्त्रों को उनके अपने संदर्भ में पढ़ें, तो एक भिन्न ही चित्र उभरता है। नियोग क्या था और क्या नहीं था?
नियोग कोई वासना-प्रधान या भोगमूलक व्यवस्था नहीं थी।
यह कोई गुप्त तांत्रिक अनुष्ठान भी नहीं था। नियोग एक सीमित, नियंत्रित और धर्मसम्मत सामाजिक व्यवस्था थी, जिसका उद्देश्य केवल एक था; वंश-परंपरा और सामाजिक निरंतरता की रक्षा। जब किसी स्त्री के पति का निधन हो चुका हो या संतान उत्पन्न करने में असमर्थ हो तब शास्त्र और समाज की अनुमति से किसी योग्य, संयमी पुरुष (अधिकतर ऋषि) द्वारा केवल सन्तानोत्पत्ति कराई जाती थी। इसमें न तो पति बदलता था, न दाम्पत्य संबंध बनता था और न ही कोई भावनात्मक अधिकार उत्पन्न होता था। संतान उसी पति की मानी जाती थी, जिसके वंश की रक्षा हेतु वह उत्पन्न हुई।
नियोग का सबसे प्रामाणिक उदाहरण महाभारत में मिलता है। राजा विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद हस्तिनापुर का वंश संकट में पड़ा। उस समय महर्षि वेदव्यास द्वारा रानी अंबिका और अंबालिका के साथ नियोग कराया गया, जिससे धृतराष्ट्र और पांडु का जन्म हुआ। यह कोई चोरी-छिपी की गई प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि राज्य और समाज की स्वीकृत व्यवस्था थी। यदि नियोग अनैतिक होता, तो महाभारत जैसा धर्मग्रंथ उसे इतने स्पष्ट रूप में प्रस्तुत न करता।
सबसे कठिन प्रश्न यह है कि क्या इसमें संभोग होता था? इसका उत्तर है हाँ! शास्त्रीय नियोग में प्रत्यक्ष संभोग होता था। लेकिन यही वह बिंदु है जहाँ आधुनिक दृष्टि अक्सर चूक जाती है। यह संभोग काम-सुख के लिए नहीं था।भावनात्मक या वैवाहिक संबंध नहीं बनाता था।
गर्भ ठहरते ही नियोग समाप्त हो जाता था और नियोगकर्ता पुरुष पुनः ब्रह्मचर्य में लौट जाता था। आज जब आधुनिक समाज शुक्राणु दान, आईवीएफ और सरोगेसी को नैतिक मानता है, तब यह प्रश्न उठता है कि क्या नियोग वास्तव में उनसे अधिक “अनैतिक” था या केवल अधिक ईमानदार?
नियोग को स्त्री-विरोधी कहने से पहले यह समझना आवश्यक है कि वैदिक समाज में मातृत्व केवल निजी इच्छा नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व था। नियोग ने स्त्री को यह अधिकार दिया कि वह पति की अनुपस्थिति में भी सामाजिक अपूर्णता का बोझ न उठाए और संतान के माध्यम से अपनी गरिमा और स्थान बनाए रखे।
यह दृष्टि, ईमानदारी से कहें तो, कई आधुनिक समाजों से अधिक व्यावहारिक और समावेशी थी। ऐसे मे आज असहजता क्यों है? आज नियोग को लेकर जो नैतिक असहजता है, वह प्रायः पाश्चात्यीकरण और उनके दिए हुए सोच और दुराग्रह की है। यह पाश्चात्य सोच और शास्त्रों की अधूरी समझ का परिणाम है। समस्या नियोग में नहीं, हमारे उसे समझने के दृष्टिकोण में है।
नियोग न तो आज लागू किया जा सकता है और न ही उसे आदर्श बनाकर प्रस्तुत किया जाना चाहिए। लेकिन उसे अनैतिक, स्त्री-विरोधी या पिछड़ी व्यवस्था कह देना भी बौद्धिक अन्याय है। भारतीय वैदिक समाज समस्याओं से भागता नहीं था; वह उनके लिए व्यावहारिक, अनुशासित और नैतिक समाधान खोजता था। आज शास्त्रों को समझने की आवश्यकता है न कि उन्हें खोखले नैतिक चश्मे से तोड़-मरोड़ कर देखने की नहीं।
Related Articles
देव और मानव बनने के लिए प्रेम और न्याय का धर्म
March 7, 2023
0
धर्म सड़क पर आ गया, मर्यादा भी भंग
January 18, 2025
0
सम्बन्ध-सन्दर्भ में ‘धर्म’ की भाव-प्रवणता
August 6, 2018
0