डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
आश्रम में उस दिन एक विशेष वातावरण था। श्रावण मास का अंतिम सोमवार था। प्रातःकाल से ही शिव-मंदिर में अभिषेक चल रहा था। जल, दुग्ध, बिल्वपत्र और मंत्रोच्चार से पूरा परिसर एक दिव्य लय में डूबा हुआ था।
निरंजन भी वहाँ उपस्थित था।
उसने अब तक ध्यान, सेवा और साक्षीभाव का अभ्यास किया था, परन्तु आज वह एक नई अनुभूति से गुजर रहा था—भक्ति।
जब पुजारी ने शिवलिंग पर जल चढ़ाया और “ॐ नमः शिवाय” का उच्चारण किया, तो निरंजन के भीतर एक कंपन-सा हुआ। उसे लगा यह मंत्र केवल ध्वनि नहीं है, यह एक जीवित स्पंदन है।
वह आचार्य के पास गया और बोला– “गुरुदेव! मैंने अब तक ज्ञान और ध्यान का अभ्यास किया, परन्तु आज जो अनुभव हो रहा है वह अलग है। यह क्या है?”
आचार्य मुस्कुराए—
“यह भक्ति है। ज्ञान मन को शुद्ध करता है, ध्यान उसे स्थिर करता है, और भक्ति उसे पिघला देती है।”
निरंजन ने पूछा—
“क्या भक्ति और ज्ञान अलग मार्ग हैं?”
आचार्य ने उत्तर दिया—
“जब तक अहंकार है, वे अलग लगते हैं। जब अहंकार गल जाता है, तब दोनों एक हो जाते हैं।”
उन्होंने एक श्लोक कहा— *‘भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।’* (गीता 18.55)
“भक्ति से ही परमात्मा का तत्त्वतः ज्ञान होता है।”
निरंजन ने अनुभव किया—
अब तक वह ईश्वर को जानना चाहता था, आज वह ईश्वर को महसूस करना चाहता था।
अभिषेक के पश्चात् भजन आरम्भ हुआ। “हर हर महादेव” की ध्वनि जब सबके कंठ से निकली, तो वह सामूहिक चेतना का रूप ले गई।
निरंजन की आँखें स्वतः बंद हो गईं।
उसे लगा—वह शिवलिंग के सामने नहीं बैठा है, वह स्वयं एक शांत, अचल, ज्योतिर्मय स्तंभ बन गया है।
उसके भीतर एक भाव उठा—न कोई याचना, न कोई भय, केवल समर्पण।
आचार्य ने बाद में पूछा—
“क्या अनुभव हुआ?”
निरंजन ने धीमे स्वर में कहा—
“गुरुदेव! आज पहली बार लगा कि मैं प्रार्थना नहीं कर रहा था, प्रार्थना स्वयं हो रही थी।”
आचार्य बोले वत्स यही सच्ची भक्ति है। जब साधक नहीं रहता, केवल भावना रहती है।”
फिर उन्होंने शिव-तत्त्व की व्याख्या की और कहा कि शिव ज्ञान के भी अधिष्ठाता हैं और भक्ति के भी। वे योगी भी हैं और भोलेनाथ भी। वे समाधि में स्थित भी हैं और भक्तों के लिए सुलभ भी।
उन्होंने एक प्राचीन वचन कहा— ‘ज्ञानं शिवः, शिवो ज्ञानम्।’
अर्थात् शिव ही ज्ञान हैं और ज्ञान ही शिव है।
निरंजन ने पूछा— “गुरुदेव! क्या भक्ति में विवेक की आवश्यकता नहीं होती?”
आचार्य ने उत्तर दिया— “विवेक के बिना भक्ति अंधविश्वास बन जाती है, और भक्ति के बिना ज्ञान शुष्क हो जाता है। जब दोनों मिलते हैं, तब साधना पूर्ण होती है।”
सायंकाल में गंगा-आरती हुई। दीपों की पंक्तियाँ जल उठीं। मंत्र, घंटा और शंख की ध्वनि से वातावरण भर गया।
निरंजन ने दीप अपने हाथ में लिया।
उसने अनुभव किया— यह दीप केवल प्रकाश नहीं है, यह आत्मा का प्रतीक है। जब तक अहंकार की वायु है, लौ डगमगाती है; जब समर्पण आता है, वह स्थिर हो जाती है।
उसने मन ही मन कहा “प्रभो! मुझे ज्ञान भी दें और भक्ति भी; विवेक भी दें और प्रेम भी।”
उस क्षण उसे लगा कि ज्ञान उसे दिशा देता है, भक्ति उसे शक्ति देती है।
रात्रि में आचार्य ने अंतिम उपदेश दिया। “निरंजन! अब तुम्हारी साधना त्रिपथ बन गई है— ज्ञान, कर्म और भक्ति। यही त्रिवेणी तुम्हें आत्मबोध तक ले जाएगी।”
निरंजन ने प्रणाम किया। उसके भीतर अब कोई द्वन्द्व नहीं था। ध्यान में शांति, सेवा में करुणा और भक्ति में प्रेम; तीनों एक हो गए थे और इसी एकत्व में उसे शिव का प्रथम साक्षात्कार हुआ। रूप में नहीं वरन् अनुभूति में।