राघवेन्द्र कुमार राघव–
बड़े रंग हैं बड़े ढंग हैं,
दुनिया के खेल निराले।
कहाँ फँस गये इस विपदा मे,
हम हैं भोले-भाले।
बड़ी कठिन जीवन की राहें,
हर ओर बिछे हैं काँटे।
सभी मुसीबत बढ़ा रहे हैं,
कोई न दुःख को बाँटे।
कतरा-कतरा वक्त पिघलता,
समय बन गया एक पहेली।
परछायी भी साथ छोड़ती,
कभी परायी कभी सहेली।
नहीं सूझता यहाँ पे कुछ भी,
दुविधा का घनघोर कुहासा।
घुट-घुटकर सूरज है जीता,
धरती पर चहुँओर निराशा।
मीत यहाँ दुश्मन दिखता है,
दुश्मन प्रीति निभाता है।
नातों मे मनभेद बड़ा है,
किसको कौन सुहाता है?
प्रेम यहाँ भ्रम का फंदा है,
हर दूजा मद का अंधा है।
मन्द हुआ आशा का दीपक,
भाव प्रवणता धन्धा है।
रंग यहाँ सबके अपने हैं,
ढंग यहाँ सबके अपने हैं।
कुछ यहाँ दुरंगे मिल जाएँगे,
रह-रहकर वह भरमाएँगे।
रिश्ते ही अनमोल यहाँ हैं,
रिश्तों की शक्ति बहुत बड़ी है।
जिसके रिश्ते मजबूत यहाँ हैं,
दुनिया उसके कदमो मे पड़ी है।
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