शिवत्त्व : प्रकाश-तत्त्व और चेतना का सनातन सूत्र


शिव न किसी एक रूप, मूर्ति या कल्पना तक सीमित हैं। शिव तत्त्व हैं—अविनाशी, अव्यक्त और सर्वव्यापक।
वेद उद्घोष करते हैं—

“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।”

(श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.11)

शिव वही एक देव हैं जो समस्त प्राणियों में गुप्त रूप से स्थित होकर सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं। इसी कारण शिव ज्योति भी हैं और दीप भी—प्रकाश के स्रोत भी और प्रकाश के वाहक भी। शिव ही वह चेतना हैं जो अज्ञान के तम को विदीर्ण करती है और बोध का उदय कराती है।

लिंगपुराण और शिवपुराण में शिव को अनादि ज्योतिर्लिंग कहा गया है—ऐसी ज्योति जिसका न आदि है, न अंत। यह ज्योति आकाश की भाँति सर्वत्र व्याप्त है। आकाश स्वयं दृश्य नहीं होता, परन्तु सब कुछ उसी में घटित होता है—ठीक वैसे ही शिव स्वयं अव्यक्त हैं, किन्तु सृष्टि का प्रत्येक स्पंदन उन्हीं में घटित होता है।

“आकाशवत् सर्वगतं शिवं।”
—आगमिक परम्परा

शिव योग हैं—परन्तु केवल आसन या साधना-पद्धति के अर्थ में नहीं। शिव चित्त-वृत्ति निरोध की पराकाष्ठा हैं। वे समाधि में स्थित होकर भी संसार से विमुख नहीं होते। यही शिव का वैशिष्ट्य है—पूर्ण वैराग्य में भी पूर्ण करुणा

पतञ्जलि के योगसूत्रों में जिस कैवल्य की चर्चा है, शिव उसका साकार प्रतीक हैं। वे स्वयं भोग से परे हैं, परन्तु भोगियों के भी आश्रय हैं। इसीलिए उन्हें आशुतोष कहा गया—जो भाव देखकर ही अनुग्रह कर देते हैं।

शिव को कामहंता कहा गया है, पर इसका अर्थ वासना-विरोध नहीं, बल्कि वासना पर विजय है। कामदहन की कथा प्रतीक है—जब इच्छा अनियंत्रित होती है तो सृष्टि को भस्म कर देती है, और जब चेतना में विलीन होती है तो वही इच्छा तप बन जाती है।

शिव केवल संहारकर्ता नहीं, वे प्राण-तत्त्व भी हैं। रुद्र का अर्थ ही है—जो रुलाता भी है और जिलाता भी है। वे संहार के माध्यम से ही नवीन सृजन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

शिव का पंचानन स्वरूप जीवन की अबूझ पहेली नहीं, बल्कि उसका सूत्र है। पाँच मुख पाँच महाभूतों के प्रतीक हैं—

  • पृथ्वी – स्थिरता और धैर्य
  • जल – करुणा और प्रवाह
  • अग्नि – चेतना और रूपान्तरण
  • वायु – प्राण और गति
  • आकाश – विस्तार और शून्यता

इन पंचतत्त्वों के संतुलन से ही जीवन संभव है। शिव इन तत्त्वों के अधिष्ठाता हैं—अतः शिव के बिना जगत केवल जड़ संरचना है। इसी सत्य को भारतीय परम्परा ने अत्यन्त सरल सूत्र में कहा—

“शिवस्य त्यागे शवः”
जहाँ शिव का अभाव है, वहाँ जीवन शव मात्र है।
और जहाँ शव में शिवत्त्व का प्रवेश हो जाए, वही अमृतत्व को प्राप्त करता है।

आपके द्वारा उद्धृत मंत्र शिव की त्रिगुणातीत सत्ता को स्पष्ट करता है। शिव न सत्त्व हैं, न रज, न तम—वे इन तीनों के साक्षी हैं। जीवन के द्वन्द्व—लाभ-हानि, सुख-दुःख, जय-पराजय—शिव के समत्व में लीन हो जाते हैं।भगवद्गीता में जिस स्थितप्रज्ञ का वर्णन है, वही शिवत्त्व का मानवीय रूप है।

भारत की सनातन वैदिक संस्कृति का मूल शिव ही हैं। ऋग्वेद के रुद्र, यजुर्वेद के शतरुद्रीय, उपनिषदों के महेश्वर—सब एक ही तत्त्व के विविध नाम हैं। भारतीय मनीषा ने बहुत पहले जान लिया था कि प्रकृति से संघर्ष नहीं, एकात्मता ही जीवन का आधार है। इसी कारण यहाँ पर्व, व्रत और उपासना प्रकृति-संवेगों से जुड़ी हैं। शिव आराधना में पर्वत, नदी, वृक्ष, भस्म—सब पूज्य हैं। यह दृष्टि पर्यावरण-संरक्षण की नहीं, पर्यावरण-पूजन की है। याद रहे “बोध है तब ही व्यक्ति सामाजिक है।”

शिव बोधतत्त्व हैं। जहाँ बोध है, वहाँ अहं का क्षय होता है। अहं के क्षय से ही सद्भाव, करुणा और एकता संभव होती है। भारतीय दर्शन का मूल यही है कि समस्त प्राणियों में वही एक आत्मतत्त्व विद्यमान है।

“ईशावास्यमिदं सर्वं।”
(ईशोपनिषद्)

इस बोध से ही जाति, धर्म और राष्ट्र की संकीर्ण दीवारें ढहती हैं। शिवत्त्व की जागृति व्यक्ति को विश्व-मानव बनाती है।

शिव कोई दूर स्थित देवता नहीं—शिव जागृत चेतना हैं। शिवत्त्व का अर्थ है—समत्व, करुणा, वैराग्य और उत्तरदायित्व। महाशिवरात्रि केवल एक तिथि नहीं, बल्कि अज्ञान से ज्ञान की रात्रि है।

यदि शिवत्त्व का प्रसार हो— तो संघर्ष; शान्ति में बदले, सत्ता; सेवा बने, व्यक्ति; समाज बने और समाज; मानवता।

यही शिव का संदेश है, यही सनातन का सार।