‘सर्जनपीठ’ का श्रद्धांजलि-समारोह
शैक्षिक, बौद्धिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक संस्था ‘सर्जनपीठ’ के तत्त्वावधान में १० दिसम्बर को ‘स्मृति-शेष मंगलेश डबराल’-विषयक एक श्रद्धांजलि-समारोह का आयोजन प्रयागराज में किया गया। मंगलेश डबराल एक कवि ही नहीं थे, बल्कि एक कुशल गद्यकार भी थे, जिसे ‘लेखक की रोटी’ और ‘कवि का अकेलापन’ प्रमाणित करती हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित मंगलेश डबराल की कविताओं के अँगरेज़ी, जर्मन, रूस, इटैलियन, फ्रेंच आदिक भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं।
इलाहाबाद में रहकर पत्रकारिता और काव्य-साधना करनेवाले ऐसे सारस्वत हस्ताक्षर के कर्तृत्व पर प्रकाश डालते हुए, अध्यात्मविद् डॉ० रामनरेश त्रिपाठी ने बताया, “मंगलेश जी ने लगभग तीन वर्षों तक इलाहाबाद में रहकर काव्य-साधना करते हुए एक दैनिक समाचारपत्र के रविवासरीय परिशिष्ट (साहित्य) को इतना समृद्ध कर दिया था कि साहित्य का पक्ष अत्यन्त उन्नत दिखने लगा था।”
वरिष्ठ रंगकर्मी और पत्रकार अभिलाष नारायण ने बताया, “मैं उनसे मिला नहीं था; परन्तु उनकी रचनाओं को पढ़ने का अवसर मिलता रहा है।”
संयोजक भाषाविद्-समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, मंगलेश डबराल जी जब एक दैनिक समाचारपत्र के साहित्य-सम्पादक थे तब हमारा लगभग प्रति-सप्ताह मिलना होता था। मैं बाल-साहित्य स्तम्भ के लिए लिखता था। वे एक मितभाषी थे और विवाद से परे एक विशुद्ध साम्यवादी विचारक भी।”
साहित्यकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने कहा, “उनकी कविताओं में सामन्ती बोध और सर्वहारा-वर्ग की तकलीफ़ों का चित्रण है।”
वरिष्ठ पत्रकार तौक़ीर ख़ान ने बताया, “वे समाज की चिन्ता करनेवाले साहित्यकार थे।”
वरिष्ठ पत्रकार आनन्द सागर ओझा ने कहा, “डबराल जी की कविताओं में सहज अनुभूति होती है।”