डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
श्रावण का अन्तिम सप्ताह बीत चुका था। आश्रम का वातावरण अब अधिक शांत था। वर्षा की रिमझिम ध्वनि, वृक्षों से टपकती जल-बूँदें और दूर बहती नदी का मधुर स्वर—सब मिलकर एक स्वाभाविक मौन रच रहे थे।
निरंजन ने ध्यान किया कि आश्रम में आज आचार्य किसी से अधिक संवाद नहीं कर रहे थे। वे केवल आवश्यक संकेतों से कार्य करा रहे थे। भोजन के समय भी उन्होंने कुछ नहीं कहा। सायंकालीन सत्संग में भी वे मौन ही रहे।
अगले दिन प्रातः उन्होंने एक घोषणा की—
“आश्रम में तीन दिन का मौन-व्रत रहेगा। केवल अत्यावश्यक कार्य के लिए संकेतों का उपयोग होगा।”
निरंजन के मन में प्रश्न उठा—
“क्या मौन केवल बोलना बंद करना है, या कुछ और?”
परन्तु नियम था—प्रश्न भी नहीं पूछना।
प्रारम्भ में उसे लगा—मौन सरल है।
परन्तु कुछ ही घण्टों में उसने अनुभव किया कि बोलना बंद करना आसान है, परन्तु मन को शांत करना कठिन है।
विचारों का एक प्रवाह भीतर चल रहा था—
स्मृतियाँ, योजनाएँ, कल्पनाएँ।
उसे आचार्य का एक पुराना वचन स्मरण आया—
“वाणी का मौन तभी पूर्ण होता है जब मन का कोलाहल शांत हो।”
वह नदी तट पर बैठा और श्वास पर ध्यान केन्द्रित किया।
धीरे-धीरे विचारों की तीव्रता कम होने लगी।
दूसरे दिन उसने एक नई बात अनुभव की—
जब वह बोलता नहीं था, तब वह दूसरों को अधिक ध्यान से सुन पाता था।
एक वृद्ध साधक लकड़ी काट रहे थे।
पहले वह उनके पास जाकर सहायता का प्रस्ताव देता, कुछ संवाद करता।
आज वह बिना बोले उनके पास गया और लकड़ी उठाने लगा।
वृद्ध ने उसकी ओर देखा और मुस्कुरा दिए।
कोई शब्द नहीं बोले गए,
परन्तु संवाद हो गया।
निरंजन ने अनुभव किया—
शब्दों से परे भी संबंध संभव है।
उसे यह भी अनुभव हुआ कि वह कितनी बार अनावश्यक बोलता था—
अपनी बात सिद्ध करने के लिए,
प्रभावित करने के लिए,
या केवल मौन से बचने के लिए।
अब उसे वाणी की शक्ति और उसकी असावधानी दोनों का बोध हो रहा था।
तीसरे दिन उसका मन अपेक्षाकृत शांत था।
वह शिव-मंदिर के सामने बैठा था।
दीपक की लौ स्थिर थी।
उसे लगा—मौन भी एक दीपक है।
उसके भीतर एक वाक्य स्वतः उठा—
“जब शब्द समाप्त होते हैं, तब सत्य बोलता है।”
उसी समय आचार्य वहाँ आए।
मौन-व्रत समाप्त होने वाला था।
उन्होंने सभी साधकों को एकत्र किया और कहा—
“मौन केवल वाणी का निरोध नहीं,
वाणी का परिष्कार है।
जो मौन में वाणी को शुद्ध करता है,
उसके शब्द मंत्र बन जाते हैं।”
फिर उन्होंने एक सूक्ति कही—
‘सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।’
अर्थात् सत्य बोलो, प्रिय बोलो, पर अप्रिय सत्य भी असावधानी से न बोलो।
निरंजन ने पूछा—
“गुरुदेव! क्या कम बोलना ही श्रेष्ठ है?”
आचार्य ने उत्तर दिया—
“कम बोलना नहीं, सही बोलना श्रेष्ठ है।
और सही बोलना तभी संभव है जब भीतर मौन हो।”
उन्होंने आगे कहा—
“वाणी में तीन दोष होते हैं—असत्य, कठोरता और असंयम।
मौन इन तीनों को शुद्ध करता है।”
उस दिन से निरंजन ने एक नियम बनाया—
वह बोलने से पहले तीन प्रश्न करेगा— पहला क्या यह सत्य है? दूसरा क्या यह आवश्यक है और तीसरा क्या यह करुणा से भरा है?
यदि तीनों का उत्तर ‘हाँ’ होगा, तभी वह बोलेगा।
धीरे-धीरे उसने अनुभव किया—
उसके शब्द कम हो गए, पर प्रभावी हो गए।
लोग उसे अधिक ध्यान से सुनने लगे।
उसे लगा—
पहले वह शब्दों से ऊर्जा खोता था,
अब शब्दों से ऊर्जा उत्पन्न होती है।
रात्रि में ध्यान करते समय उसे शिव का ध्यान आया—
समाधिस्थ, मौन, अचल।
उसे लगा—
शिव का मौन शून्यता नहीं है,
पूर्णता है।
वह मौन जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि समाहित है।
उसने अनुभव किया—
जब भीतर मौन होता है, तब वाणी शिव का प्रसाद बन जाती है।
आचार्य ने कहा—
“निरंजन!
अब तुम्हारी साधना में एक और आयाम जुड़ गया है।
ज्ञान ने तुम्हें दिशा दी,
कर्म ने तुम्हें शुद्ध किया,
भक्ति ने तुम्हें पिघलाया,
और मौन तुम्हें गहराई देगा।
जब तुम्हारी वाणी मौन से जन्म लेगी,
तब वह लोककल्याण का साधन बनेगी।”
निरंजन ने प्रणाम किया।
उसे लगा—
अब वह केवल साधना नहीं कर रहा,
साधना स्वयं उसे गढ़ रही है।
और उसी मौन में
एक नई यात्रा प्रारम्भ हुई—
जहाँ शब्द भी तप थे और मौन भी।