● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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इन दिनो उत्तरप्रदेश के सियासी गलियारोँ मे एक ही बात की अनुगूँज उठ रही है– आदित्यनाथ योगी का सिँहासन डोल रहा है और इसके पीछे उनके अपने ही लोग हैँ, जो एक-दूसरे की विरुदावली गाते आ रहे थे। वैसे तो शीत-युद्ध के रूप मे इसकी शुरूआत उस समय से ही हो गयी थी, जब केशवप्रसाद मौर्य को उत्तरप्रदेश-भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था और उनके नेतृत्व मे राज्य मे भारतीय जनता पार्टी की सरकार का गठन किया गया था, तब यह सुनिश्चित हो गया था कि मुख्यमन्त्री केशवप्रसाद मौर्य ही बनाये जायेँगे; परन्तु ऐन मौक़े पर ऐसा खेला किया गया कि मुख्यमन्त्रि-पद के रूप मे योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी कर दी गयी, जोकि केशवप्रसाद मौर्य के गुट के लिए अप्रत्याशित दृश्य था। योगी आदित्यनाथ की महत्त्वाकांक्षा के सम्मुख केशवप्रसाद की आशा पर पानी फिर गया। यही कारण है कि तब से अब तक योगी बाबा केशवप्रसाद की आँखोँ की किरकिरी बने हुए हैँ, जिसके कारण उत्तरप्रदेश की सत्ता के गलियारे मे दो फाड़ दिखता आ रहा है।
आदित्यनाथ योगी केन्द्रीय सत्ता की आँखोँ को भी नहीँ सुहाते; क्योँकि योगी की दृष्टि केन्द्रीय सिँहासन पर स्थिर हो चुकी है। केन्द्र के दो चेहरे नरेन्द्र मोदी और अमित शाह भी काफ़ी समय से योगी की अतिरिक्त महत्त्वाकांक्षा को भाँपते आ रहे हैँ। यही कारण है कि कई महत्त्वपूर्ण गतिविधियोँ से योगी को दूर रखा जा रहा है और केशव को प्राथमिकता दी जा रही है। इसे अमित शाह की कई बैठकोँ मे देखा भी गया है। योगी भी अपनी सामर्थ्य को पहचान चुके हैँ; क्योँकि देश के अन्य राज्योँ मे कराये गये चुनावोँ मे जिस तरह से मोदी-शाह ने ‘पोस्टर-ब्वॉय’ के नाम-रूप से आदित्यनाथ की भगवा-पहचान का इस्तेमाल किया था, उससे योगी को विश्वास हो चुका है कि वह मोदी की कुर्सी के वास्तविक अधिकारी बन चुके हैँ। भारतीय जनता पार्टी के चाणक्य कहलानेवाले अमित शाह की नज़रेँ भी अगले प्रधानमन्त्री के रूप मे स्थिर हैँ। ऐसे मे, ज़ोर-आज़्माइश का होना अनिवार्य दिख रहा है।
आदित्यनाथ योगी कहने और सुनने के लिए ‘योगी’ हैँ, जबकि उनकी मूल पहचान ‘क्षत्रिय’ के रूप मे है। इसप्रकार अजय सिँह बिष्ट एक गढ़वाली क्षत्रिय हैँ। यही कारण है कि मुलायम सिँह यादव और अखिलेश यादव की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए, उत्तरप्रदेश के वर्तमान मुख्यमन्त्री अपने राज्य मे महत्त्वपूर्ण पदोँ पर ‘ठाकुरोँ’ को भरे हुए हैँ और अन्य जातियोँ, विशेषत: ‘ब्राह्मणो’ को उपेक्षित किये हुए हैँ। इससे ब्राह्मणवर्ग योगी की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीँ है। इतना ही नहीँ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मे भी ब्राह्मणवर्ग का प्रतिनिधित्व करनेवाला कोई नहीँ है, इसलिए भारतीय जनता पार्टी के ब्राह्मण-विधायक भी संतुष्ट नहीँ हैँ। यही कारण है कि अब उत्तरप्रदेश की राजनीतिक मंच पर ‘ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय’ का शीतयुद्ध कुछ गरमाहट के साथ दिखने लगा है।
बेशक, उत्तरप्रदेश का पारा तो गिर रहा है; परन्तु सियासी पारा तेज़ी मे चढ़ता दिख रहा है। हाल ही मे कुन्दरकी के विधायक ठाकुर रामवीर सिँह और भारतीय जनता पार्टी के एम० एल० सी० जयपाल सिँह व्यस्त की पहल पर कुछ समय पूर्व क्षत्रिय-विधायकोँ और एम० एल० सी० सदस्योँ ने ‘कुटुम्ब’ के नाम पर लखनऊ के क्लार्क अवध होटल मे बैठक की थी, जिसमे भा० ज० पा० और समाजवादी पार्टी के विद्रोही-असंतुष्ट क्षत्रिय-विधायक भी शामिल थे। उनके अलावा अन्य जातियोँ (ग़ैर-ब्राह्मण) के भी कुछ विधायक आये थे। कथित ‘कुटुम्ब’ बैठक योगी-सरकार के गठित होने के बाद पहली बार की गयी थी। इतना ही नहीँ, क्षत्रिय-विधायकोँ ने एक ह्वाट्सऐप्प-समूह भी बनाया है, जिसमे पक्ष-विपक्ष के क्षत्रिय-विधायकोँ को शामिल किया गया है। जब क्षत्रिय-विधायकोँ से उस अप्रत्याशित बैठक-आयोजन का कारण पूछा गया था तब गोल-मोल जवाब दिया गया था– कोई ठाकुर रामवीर सिँह की जीत की ख़ुशी बता रहा था; कोई जन्मदिन-पार्टी कह रहा था तो कोई उसे पारिवारिक निमन्त्रणवाली पार्टी बता रहा था। उस बैठक मे जो ख़ास चेहरे दिख रहे थे, उनमे समाजवादी पार्टी से निष्कासित एम० एल० सी० राकेशप्रताप सिँह, विधायक अभय सिँह, बहुजन समाज पार्टी-विधायक उमाशंकर सिँह इत्यादिक थे। ‘कुटुम्ब’ नाम से आयोजित क्षत्रिय-विधायकोँ की बैठक मे राम की एक मूर्ति, महाराणा प्रताप का चित्र और पीतल का एक बड़ा त्रिशूल दिया गया था। इस बैठक की विशेषता थी कि उसमे दयाशंकर सिँह से लेकर जयवीर सिँह मन्त्री तक शामिल थे।
ब्राह्मण-विधायक क्षत्रिय-विधायकोँ से पहले से ही खुन्नस खाये हुए थे, प्रतिक्रियास्वरूप ब्राह्मण-विधायकोँ ने भी ‘सहभोज’ के नाम से अपनी एक प्रभावकारी बैठक कर डाली थी, जोकि एकप्रकार का सियासी शक्तिप्रदर्शन था। ब्राह्मणवर्ग के विधायकोँ की ओर से बताया गया था कि भारतीय जनता पार्टी के विधायक पंचानन्द पाठक की पत्नी के जन्मदिन (शुद्ध शब्द ‘जन्मदिनांक’ वा ‘जन्मतारीख़’ है।) के अवसर पर लखनऊ-स्थित उनके आवास पर बैठक की गयी थी, जिसमे पूर्वांचल और बुन्देलखण्ड के केवल ब्राह्मण-विधायक शामिल थे। वह बैठक संध्या ७ बजे से मध्यकालीन १२ बजे तक चलती रही। उसमे आर्थिक रूप से पिछड़े ब्राह्मणो के लिए एक ‘कोष’ बनाने का निर्णय किया गया।
अब यहाँ एक यक्ष-प्रश्न का उठाया जाना तार्किक है– पंचानन्द पाठक की पत्नी का कथित जन्मदिन और केवल ब्राह्मण-विधायकोँ को निमन्त्रण; क्षत्रिय और अन्य जातियोँ के विधायकोँ की उपेक्षा क्योँ की गयी? ज़ाहिर है, इसका उत्तर पंचानन्द पाठक के पास नहीँ होगा। एक अन्य प्रश्न भी– क्या इससे पहले पंचानन्द ने अपनी पत्नी का जन्मदिन मनाया था और यदि हाँ तो उसमे किन जातियोँवाले विधायकोँ को बाटी-चोखा, फलादिक खाने के लिए परोसा गया था?
कुछ ब्राह्मण-विधायकोँ को कुरेदा गया तब बात सामने आयी कि राज्य मे कई जातियाँ, विशेषत: क्षत्रिय-जाति ब्राह्मणो की तुलना मे अधिक शक्तिशाली हो चुकी है, जिसके कारण ब्राह्मण-विधायकोँ की आवाज़ दबायी जा रही है। ब्राह्मणवर्ग की आवाज़ मुखरता के साथ कैसे उठायी जाये, इसके लिए बैठक की गयी है। बैठक मे यह भी चिन्ता व्यक्त की गयी कि एक दारोग़ा से लेकर एस० डी० एम०-डी० एम० तक ब्राह्मण-विधायकोँ की नहीँ सुन रहा है। ब्राह्मण-जाति के ब्रजेश पाठक को ‘डिप्टी सी० एम० बना तो दिया गया है; परन्तु उन्हेँ न तो कोई शक्ति दी गयी है और न ही महत्त्व दिया गया है। उस बैठक मे कुछ ऐसे विधायक भी सम्मिलित थे, जो काफ़ी समय से भारतीय जनता पार्टी के महत्त्वपूर्ण चेहरे रहे हैँ, जिनमे नरेन्द्र मोदी के पूर्व-मुख्य सचिव नृपेन्द्र मिश्र के पुत्र और एम० एल० सी० साकेत मिश्र, देवरिया-विधायक शलभमणि त्रिपाठी, नवतनवा-विधायक ऋषि त्रिपाठी, मीरज़ापुर-विधायक रत्नाकर मिश्र, बदलापुर-विधायक रमेश मिश्र, बाँदा-विधायक प्रकाश द्विवेदी इत्यादिक थे। बैठक मे तय किया गया कि ब्राह्मण-विधायकोँ की एक और बैठक जनवरी मे की जायेगी।
अब सवाल मुँह बाये खड़ा है– दोनो ओर से आँखेँ दिखातीँ सियासी अँगड़ाई क्या-क्या गुल खिलानेवाली हैँ? इन क्रियाओँ की प्रतिक्रियाएँ भी बेहद दिलचस्प होँगी। क्षत्रिय-बैठक से यह सुस्पष्ट हो चुका है कि उत्तरप्रदेश-शासन मे सबकुछ ठीक-ठाक नहीँ है। क्षत्रिय-विधायक ‘घोर ठाकुरवादी’ मुख्यमन्त्री कहलानेवाले आदित्यनाथ से किसप्रकार की अपेक्षा करते हैँ वा फिर सारे दलोँ के ठाकुरवादियोँ ने आदित्यनाथ के पक्ष मे एकजुटता की कोई मुहिम शुरू कर दी हो; क्योँकि उत्तरप्रदेश मे त्रिकोणीय राजनीति दिखने लगी है, जिसमे ‘अमित शाह+केशवप्रसाद मौर्य = योगी को हटाओ’ का गणितीय सूत्र भी साफ़-साफ़ दिखने लगा है। फ़िलहाल, क्षत्रिय बनाम ब्राह्मण के तत्कालीन एकदिवसीय मैच का कोई परिणाम नहीँ निकला है; हो सकता है, जब टी-20 हो तब कोई नतीजा सामने आये।
उत्तरप्रदेश मे ४६ ब्राह्मण विधायक भारतीय जनता पार्टी के हैँ। वे सब बैठक मे सम्मिलित थे। पक्ष-विपक्ष के कुल ५२ ब्राह्मणो को पिछले २३ दिसम्बर को कुशीनगर के विधायक पी० एन० पाठक (पंचानन्द पाठक) के घर मे उपस्थित होना बताया गया है, जिनमे भूमिहार ब्राह्मण भी सम्मिलित थे।
ब्राह्मणो की आवाज़ दबायी जा रही है; मुख्य मुद्दोँ पर बात नहीँ की जा रही है। कुछ जातिविशेष (ठाकुर/क्षत्रिय, दलित, पिछड़ी जातियाँ इत्यादि) के लिए यह सरकार नियम-क़ानून को ताक़ पर रखकर काम करती आ रही है; क्योँकि योगी आदित्यनाथ स्वयं ‘ठाकुर’ हैँ। भारतीय जनता पार्टी और अन्य विपक्षी दलोँ के ब्राह्मण-विधायकोँ ने एक होकर इसपर चिन्ता व्यक्त की है।
ब्राह्मण-विधायकोँ की बैठक मे जो निर्णय किये गये थे, वे हैँ :–
१– ब्राह्मण-समाज को संघटित करना है।
२– सोशल मीडिया पर सक्रियता बढ़ानी है।
३– प्रत्येक दो माह मे बैठक करनी है।
४– प्रत्येक ज़िले मे एक ‘प्रेशर ग्रुप’ बनाना है।
५– ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का सूत्र लागू हो।
६– आर्थिक रूप से पिछड़े ब्राह्मणवर्ग के लिए एक कोष बनाया जायेगा।
इस आकस्मिक बैठक का किया जाना, वर्तमान उत्तरप्रदेश-शासन की नीति और नीयत पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता हुआ दिख रहा है। उधर, इन बैठकोँ की जानकारी पाते ही शासन के गलियारे मे साँस का ऊपर-नीचे उठना शुरू हो गया है। योगी भी चिन्तित हैँ। यही कारण है कि उन्होँने अपने ओ० एस० डी० सरवन बघेल के माध्यम से बैठक का कारण जानना चाहा, जिसे एक सामान्य आयोजन बताकर टाल दिया गया। ब्राह्मण-विधायकोँ ने निश्चित किया है कि आगामी ५ जनवरी को उनकी अगली बैठक होगी, जिसमे सेवानिवृत्त प्रशासनिक ब्राह्मण-अधिकारियोँ को भी निमन्त्रित किया जायेगा।
सम्पर्क-सूत्र :–
9919023870
prithwinathpandey@gmail.com
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