उत्तरप्रदेश-विधानसभा का चुनाव-परिणाम देश को चौंका सकता है

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

इस समय उत्तरप्रदेश- विधानसभा-चुनाव मे दो ही दल वास्तविक चुनावी मैदान मे दिख रहे हैं, शेष की भूमिका मतदाताओं को प्रभावित करने की रहेगी। पहली ओर ‘बहुजन समाज पार्टी’ की मायावती हैं, जिन्हें चुनाव-प्रचार करने के प्रति कोई रुचि नहीं है। मायावती को चमार, पासी, खटिक, सोनकर इत्यादिक सरकारी दलित जातियों पर भरोसा है और दूसरी ओर, ‘भारतीय काँग्रेस पार्टी’ की प्रमुख नेत्री प्रियंका गांधी हैं, जो वेण्टिलेटर पर लेटी हुई अपनी पार्टी को ‘संजीवनी’ बूटी देने का काम कर रही हैं।

पहले मायावती-चरित्र को समझते हैं। उन्हें जितनी भी सीटें मिलेंगी, वे ‘भारतीय जनता पार्टी’ के साथ जुड़ जायेंगी; क्योंकि वैसा करना मायावती की बाध्यता और विवशता रहेगी। उन्होंने मुसलमान प्रत्याशियों को बड़ी संख्या मे टिकट देकर अखिलेश यादव के मत-प्रतिशत को प्रभावित करने का मन बना लिया है। मायावती अपने शासनकाल मे जितने भी प्रकार घोटाले किये और कराये थे; अपने भाई को आय से अधिक सम्पत्ति का स्वामी बनाया था, वे सभी कर्मकुण्डली के रूप मे नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के पास हैं; उच्चतम न्यायालय मे उनकी कर्मकुण्डली-फ़ाइल दबवाकर सुरक्षित रखवा दी गयी है। यही कारण है कि मायावती न चाहते हुए भी ‘भारतीय जनता पार्टी’ के पक्ष मे जायेंगी।

प्रियंका गांधी का नारा ”लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ” चुनावी मौसम मे परवान चढ़ चुका है। ४० प्रतिशत महिलाओं को सीट देना और नयी युवाशक्ति को साथ लेकर चलना, प्रियंका गांधी के लिए ‘भोर की लाली’ सिद्ध हो सकती है। इस दृष्टि से प्रियंका की पार्टी यदि लगभग २५ सीटें अपने अधिकार मे कर लेती है तो यह उनकी बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है।

उत्तरप्रदेश की लगभग ७० प्रतिशत जनता राज्य मे सत्ता-परिवर्त्तन चाहती है। इसका प्रमुख कारण है, योगी आदित्यनाथ और उनके सरकारी तन्त्र का मनमानापन; हिन्दू- मुसलमान के नाम पर साम्प्रदायिक विद्वेष को हवा देना; हिन्दुओं के साथ छलावा करना; मध्यमवर्गीय हिन्दू-परिवारों को सुविधा-साधन से वंचित रखना। हिन्दू-संघटनो-द्वारा ‘लव जिहाद’, ‘गोहत्या’ ‘मॉब लिंचिंग’ आदिक कुकृत्य के नाम पर बेगुनाह मुसलमान युवकों की बेरहमी से हत्या करवाना; सरकार की ग़लत और दूषित नीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठानेवालों को अवैध ढंग से कारावास की सज़ा देना और ऐसे प्रकरणों मे फँसा देना, जो ग़ैर-ज़मानती बना दिये जाते हैं। योगी-द्वारा प्रतिशोधस्वरूप बुल्डोजर चलवाने के नाम पर समदर्शिता का अभाव दिखना; किसानो की आय दोगुणा करने के नाम पर ‘विश्वासघात’ का परिचय देना; अहंकार से भरपूर आचरण का परिचय देना आदिक निन्दनीय कृत्य योगी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं। शासकीय साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संस्थानो मे अध्यक्ष और सचिव; ज़िला-प्रशासन मे उच्चस्तरीय पदों पर एक जाति-विशेष (क्षत्रिय) के व्यक्तियों की नियुक्तियाँ शैक्षणिक आयोग और समितियों मे भी उसी जाति-विशेष की प्रमुखता किस मनोवृत्ति की परिचायिका है। ‘भारतीय जनता पार्टी’ ने पाँच वर्षों-पूर्व जिस ‘संकल्पपत्र’/’घोषणापत्र’ के बल पर सत्ता पायी थी, उसमे दिये गये एक भी वायदा पूरा नहीं कर पायी है। योगी आदित्यनाथ स्थानो के नाम बदलते रहे; समाज मे घृणा फैलानेवाले भाषण करते रहे; झूठे आँकड़े दिखाते रहे; कोविड-संक्रमणवाले रोगियों को ‘जीवनदायिनी’ गैस-सिलिण्डर उपलब्ध कराने मे नाकाम रहे; अधिकतर रोगियों को चिकित्सालयों मे भरती कराने के लिए बिस्तरे तक उपलब्ध नहीं कराये गये; समुचित उपचार करने मे उनका चिकित्सातन्त्र विफल रहा। उनका प्रशासनतन्त्र हिन्दुओं को श्मशानघाट और शववस्त्र उपलब्ध कराने मे असमर्थ रहा। राज्य के नागरिक स्वजन को कोविड से बचाने के लिए गिड़गिड़ाते रहे; परन्तु उनकी चीख़ें और सिसकियाँ पत्थर दिलवाले शासन और प्रशासनतन्त्र को पिघला न सकीं।

अब हम राजनेताओं-द्वारा बोयी गयी धर्म, जातीय तथा वर्गीय फ़स्लों की लहलहाहट को समझते हैं।

उत्तरप्रदेश के प्रत्येक ज़िले मे दो ही पार्टियाँ एक-दूसरे को ललकारती हुई दिख रही हैं :– पहली का नाम ‘भारतीय जनता पार्टी’ है और दूसरी का ‘समाजवादी पार्टी’। पहले का चेहरा घोर हिन्दूवादी योगी आदित्यनाथ तो दूसरे का संतुलन बनाकर चलते हुए दिख रहे अखिलेश यादव हैं। दोनो की जाँघ की ताक़त किसी से कम नहीं दिखती। यही कारण है कि दोनो एक-दूसरे के विरुद्ध ताल ठोंक रहे हैं। चुनाव-अधिसूचना प्रसारित होने से पूर्व ही अखिलेश यादव ने छोटे-छोटे राजनैतिक दलों के प्रति विश्वास व्यक्त करते हुए, उन्हें अपनी ओर कर लिया है। ऐसा इसलिए कि पिछले चुनावों मे मायावती और प्रियंका गांधी की पार्टी के साथ समझौता करना अखिलेश के लिए महँगा साबित हो चुका था। वैसे अखिलेश यादव का प्रियंका गांधी के साथ ‘आपसी समझ और आपसी आवश्यकता’ के आधार पर ‘मौखिक’ समझौता हो चुका है; क्योंकि दोनो का उद्देश्य एक ही है– योगी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाना।

चुनावी बिगुल बजाया जा चुका है। उत्तरप्रदेश की ४०३ सीटों के लिए राजनैतिक योद्धाओं ने कमर कस ली हैं। १० फ़रवरी से ७ मार्च, २०२२ ई० तक कुल सात चरणो मे मतदान कराये जायेंगे।

दो प्रबल प्रतिद्वन्द्वी :– योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव मे इतनी सामर्थ्य नहीं है और न ही स्वयं पर भरोसा है कि वे अपनी-अपनी पार्टी के बल पर चुनाव जीत कर दिखा सकें। यही कारण है कि दोनो ही को बैसाखी के रूप मे अन्य दलों का सहारा लेना पड़ा है। योगी आदित्यनाथ को अपना दल (सोनेलाल), निषाद पार्टी, प्रगतिशील समाज पार्टी, मानव क्रान्ति पार्टी, राष्ट्रीय जलवंशी क्रान्ति दल, सामाजिक न्याय नव लोक पार्टी, पृथ्वीराज जनशक्ति पार्टी, भारतीय समता समाज पार्टी, भारतीय सुहेलदेव जनता पार्टी, मानवहित पार्टी, भारतीय मानव समाज पार्टी, मुसहर आन्दोलन मंच (ग़रीब पार्टी), शोषित समाज पार्टी। इनमे अपना दल (सोनेलाल) भारतीय जनता पार्टी के पूर्व-सहयोगियों मे से एक है। यह दल वर्ष २०१९ के लोकसभा-चुनाव के समय से ही भारतीय जनता पार्टी के साथ जुड़ा हुआ है। अपना दल (सोनेलाल) की प्रमुख नेत्री अनुप्रिया पटेल मीरज़ापुर से सांसद हैं। वर्ष २०१७ के विधानसभा-चुनाव मे उन्हें कुल ९ सीटें प्राप्त हुई थीं। उनके दल का मुख्य आधार पूर्वांचल और अवध के क्षेत्रों मे कुर्मी, काछी, पटेल और कुछ दलित जातियाँ हैं। इस पार्टी के साथ जुड़ी संजय निषाद की पार्टी निषाद पार्टी ने वर्ष २०१७ मे अपने ही बल पर १ सीट जीती थी। इन सभी छोटे-छोटे दलों को जोड़ने के पीछे भारतीय जनता पार्टी का जातीय समीकरण अपने पक्ष मे करना है।

दूसरी ओर, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने ‘सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल, अपना दल (कमेरावादी), प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया), तृणमूल काँग्रेस तथा महान दल के साथ गठबन्धन किया है। अखिलेश यादव के साथ जयन्त चौधरी के राष्ट्रीय लोकदल का उद्देश्य पश्चिम के किसानो, जाटों, गुर्जरों तथा अन्य पिछड़ी जातियों और कुछ दलितों को अपने पक्ष मे खड़े करना है, जो कि सुस्पष्ट दिख रहा है। किसानो के प्रति भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं की उदासीनता अब सामना आ चुकी है। उन्हें आतंकी, नक्सली, टुकड़े-टुकड़े गैंग, परजीवी, नख़लिस्तानी, पाकिस्तानी, देशद्रोही आदिक आपत्तिजनक शब्दों से सम्बोधित करना; ७०० से अधिक किसानो की मौत पर नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ का मौन रह जाना, भला किसान-परिवार भूल सकते हैं? निश्चित रूप से इसका लाभ अखिलेश यादव और जयन्त चौधरी को मिलेगा। यहाँ उस शख़्स की बात करना प्रासंगिक जान पड़ता है, जिसका पूर्वांचल मे ज़बरदस्त जनाधार है। मेरा संकेत ओमप्रकाश राजभर की ओर है, जो सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के संस्थापक भी हैं। पिछड़ी जातियों की राजनीति करने मे माहिर राजभर की लोकप्रियता का अन्दाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले विधानसभा के चुनाव मे वे भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर ८ सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किये थे, जिनमे से वे आधी सीट (४) जीतने मे कामयाब रहे। वे पहले बहुजन समाज पार्टी के सेनापति थे। वे राजभर (भर), कहार, कुर्मी, काछी आदिक जातियों के आज भी सर्वमान्य नेता बने हुए हैं।

एम० आइ० एम० आइ० एम० के प्रमुख असदुद्दीन ओबैसी एक अलग ही प्रकार के राजनैतिक प्राणी हैं, जो केवल मुसलमानों पर डोरे डालते आ रहे हैं, जबकि मुसलमान उनकी चालाकी को समझ चुके हैं। यही कारण है कि वे ओबैसी के पक्ष मे मतदान करने को अपने मत का दुरुपयोग मानते हैं, यद्यपि उनके साथ मिलकर पूर्व-मन्त्री बाबू सिंह कुश्वाहा (जन अधिकारी पार्टी) और वामन मेश्राम (भारत मुक्ति मोर्चा) ने भागीदारी परिवर्तन मोर्चा बनाया है, जिसके गठन करने के पीछे मुसलमानो, पिछड़ों तथा दलितों की चुनावी गणित अपने पक्ष मे करना है, जो बहुत ही मुश्किल दिख रहा है।

इनके अतिरिक्त चार ऐसी पार्टियाँ हैं, जो अपने ही बल पर चुनाव-मैदान मे ताल ठोंक रही हैं। उनमे पहली, भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस (प्रियंका गांधी); दूसरी, बहुजन समाज पार्टी (मायावती); तीसरी, आजाद समाज पार्टी (चन्द्रशेखर आजाद) तथा चौथी आम आदमी पार्टी हैं। चन्द्रशेखर आज़ाद ने अखिलेश यादव के साथ गठबन्धन करने के लिए अपनी सारी ताक़त झोंक दी थी; परन्तु सफल होते-होते रह गये थे।

हम यहाँ उन दो पार्टियों के नफ़ा-नुकसान का विश्लेषण करेंगे, जिनमे से किसी एक की सरकार बनने की सम्भावना दिख रही है। पहले ‘समाजवादी पार्टी’ और उसके घटक दल की गणित समझें– उत्तरप्रदेश-विधानसभा के चुनाव मे ‘भारतीय जनता पार्टी ‘और उसके घटक दल की नीद हराम हो चुकी है, इसका कारण यह है कि फ़िलहाल, पश्चिम-उत्तरप्रदेश की कुल १३६ सीटों मे से ८० से ९० सीटें अखिलेश यादव के पक्ष मे आती दिख रही हैं। यहाँ के ९० प्रतिशत

मुसलमान और यादव; ८० प्रतिशत जाट-किसान; ५० प्रतिशत अन्य पिछड़े वर्ग और ३३ प्रतिशत दलितवर्ग, ७० प्रतिशत गुर्जर और ४५ प्रतिशत ब्राह्मण तथा ३० प्रतिशत क्षत्रिय अखिलेश यादव के पक्ष मे आते दिख रहे हैं। वर्ष २०१७ के चुनाव मे भारतीय जनता पार्टी की शानदार विजय हुई थी, तब वह कुल १३६ सीटों मे से मात्र २७ सीटों पर ही पराजित हुई थी; लेकिन अब परिदृश्य बदल चुका है।

पूर्वांचल का चुनाव रोमांचक हो चुका है। वहाँ के ९० से ९५ प्रतिशत मुसलमान अखिलेश यादव के पक्ष मे आ सकते हैं और ८० से ९० प्रतिशत यादव भी, जबकि अन्य पिछड़े-वर्ग के ६० से ६५ प्रतिशत और ५० से ५५ प्रतिशत दलित जातियाँ; ३० से ३५ प्रतिशत क्षत्रिय और ५० से ५५ प्रतिशत ब्राह्मण अखिलेश यादव के पक्ष मे आते दिख रहे हैं, शेष प्रतिशत भारतीय जनता पार्टी तथा अन्य पार्टियों मे बँटते दिख रहे हैं।

बुन्देलखण्ड मे ५० से ६० प्रतिशत मत भारतीय जनता पार्टी के पक्ष मे जाता दिख रहा है, जबकि वहाँ सर्वाधिक संकट ‘पेय जल’ का है। वहाँ खेती-किसानी भी बहुत अच्छी नहीं है। अवध का क्षेत्र भारतीय जनता पार्टी का समर्थक दिख रहा है। यहाँ पर समाजवादी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को कड़ी टक्कर देती नज़र आ रही है।

कुल मिलाकर, काँटे की लड़ाई दिख रही है। जो चुनावी परिणाम कभी मोदी और योगी के पक्ष मे दिखा करता था, वह अब समाजवादी पार्टी की ओर मुड़ चुका है; क्योंकि मोदी, शाह तथा योगी केवल शाब्दिक पहलवान हैं, यथार्थ के धरातल पर जिस प्रकार से लोकमंगलकारी काम होने चाहिए थे, उत्तरप्रदेश मे नहीं कराये गये हैं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ फ़रवरी, २०२२ ईसवी।)

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