प्रेम सभी भावों मे सबसे पावन और महान है

प्रेम सभी भावों में सबसे पावन और महान है।
प्रेम बिना जग सूना है और जीवन वीरान है।
मन, विचार और हृदय मे गहरे तक है प्रेम बसा।
प्रेम नित्य और ईश्वर है इसकी यही पहचान है।
हर प्राणी के स्वभाव में प्रेम जन्म से पलता है।
बस सबका अभिव्यक्ति का ढंग यहाँ बदलता है।
बाल्यकाल में प्रेम-परिधि बस माता तक होती है।
संग समय के प्रेम की धारा रिश्ते कितने ढोती है।
जिसका मन ग्रंथिमुक्त होकर पानी सा बहने लगता।
उसका प्रेम पवित्र और देवत्त्व प्राप्त हर जन कहता।
प्रेम रक्त-संबंधों का होता निःस्वार्थ और पावन।
आशा और विश्वास भरा झर-झर बहता जैसे सावन।
भाई-बहन का प्रेम यहाँ कर्तव्य साथ मे लाता है।
सुख-दुःख मे ये हरदम ही अपनो का साथ निभाता है।
अनजाने हृदय युगल जब बनते हैं जीवनसाथी।
विश्वास, समर्पण के साये मे प्रेम सदा मुस्काता है।
प्रेम की डोरी से बँधकर ही जीवन अर्थ पाता है।
प्रेम इसलिए मानव जीवन का सार कहा जाता है।