डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
लंका अब केवल नगर नहीं थी—
वह एक भय-शाला बन चुकी थी।
रावण ने सभा में कहा—
“अब मेरा पुत्र जाएगा।”
इंद्रजीत।
जिसने कभी पराजय नहीं देखी थी।
जिसके अस्त्र देवताओं को भी चकित कर चुके थे।
वह जानता था—
यह युद्ध साधारण नहीं है।
इसलिए उसने युद्ध नहीं चुना,
उसने भ्रम चुना।
यज्ञ किया।
अदृश्य हुआ।
आकाश से मृत्यु बरसाई।
नागपाश चला।
राम और लक्ष्मण
एक ही क्षण में
बंध गए।
सेना सन्न रह गई।
यह वही क्षण था जिसके लिए रावण वर्षों से अपने भय का साम्राज्य रचता आया था।
वानर काँपे।
कुछ ने सोचा—
“क्या यही अंत है?”
पर जाम्बवान आगे आए।
उन्होंने कहा— “यह अंत नहीं, यह परीक्षा है।”
गरुड़ आए।
नागपाश टूटा।
राम उठे।
यह संदेश था— “भ्रम सत्य को रोक सकता है, पर नष्ट नहीं कर सकता।”
इंद्रजीत लौट गया।
पर पहली बार
उसके भीतर
संशय जन्म ले चुका था।
इंद्रजीत फिर आया।
इस बार उसने यज्ञ पूर्ण किया था।
उसने शक्ति चलाई।
लक्ष्मण गिर पड़े।
धरती काँप उठी।
यह युद्ध का सबसे शांत क्षण था—
क्योंकि कोई शोर नहीं था।
राम ने लक्ष्मण को देखा।
यह वह क्षण था
जहाँ भगवान नहीं—
भाई खड़ा था।
राम बोले नहीं।
पर उनका मौन
पूरी सेना को चीर गया।
वानरों ने पहली बार
राम को रोते देखा।
यह रोना दुर्बलता नहीं था—
यह मनुष्यता थी।
रावण ने यह दृश्य नहीं देखा।
देख लेता,
तो शायद युद्ध वहीं समाप्त हो जाता।
हनुमान आगे आए।
जाम्बवान बोले—
“संजीवनी।”
यह शब्द
आशा का अंतिम दीप था।
हनुमान उड़े।
यह उड़ान
केवल पर्वत की नहीं थी—
यह मृत्यु से टकराव था।
हिमालय मौन था।
हनुमान पहुँचे।
औषधि नहीं पहचानी।
उन्होंने पूरा पर्वत उठा लिया।
यह बल का प्रदर्शन नहीं था—
यह संकल्प था।
लंका की ओर लौटते समय
रावण ने आकाश से देखा।
उसने पहली बार
हनुमान को नहीं—
अपने अंत को देखा।
संजीवनी पहुँची।
लक्ष्मण उठे।
सेना रो पड़ी।
यह युद्ध की सबसे बड़ी विजय थी।
क्योंकि— मृत्यु हार गई थी।
अब कोई भय शेष नहीं था।
अब युद्ध केवल समय का प्रश्न था।
इंद्रजीत तीसरी बार निकला।
पर अब उसके हाथ काँप रहे थे।
लक्ष्मण आगे आए।
यह व्यक्तिगत युद्ध था।
न मंत्र, न भ्रम।
केवल अस्त्र और दृष्टि।
लक्ष्मण ने कहा—
“आज अधर्म नहीं बचेगा।”
इंद्रजीत गिरा।
रावण का पुत्र मरा।
पर उससे पहले
रावण की आत्मा मरी।
लंका रोई।
पर यह शोक नहीं था—
यह शून्य था।
अब केवल रावण बचा था।
और वह जान चुका था— यह युद्ध अब टाला नहीं जा सकता।