ज़िन्दगी की जद्दोजहद
तुम्हारे पास कमी है वक्त की और मै खुद मे ही बहुत व्यस्त हूँ।हमारे रास्ते कभी एक नहीं तुम अपने मे और मैं अपने मे मस्त हूँ।जानिबे मंज़िल जाते कभी टकरा गये तो बात होगी […]
तुम्हारे पास कमी है वक्त की और मै खुद मे ही बहुत व्यस्त हूँ।हमारे रास्ते कभी एक नहीं तुम अपने मे और मैं अपने मे मस्त हूँ।जानिबे मंज़िल जाते कभी टकरा गये तो बात होगी […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– रात गहरी हो चुकी थी। हवेली के चारों ओर फैली शांति में केवल कभी-कभी पत्तों की सरसराहट सुनाई देती थी। दूर खेतों में जलती हुई मशालों की लौ हवा के साथ […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– जमींदार के कक्ष में कुछ क्षण के लिए ऐसा मौन छा गया मानो समय स्वयं रुक गया हो। सुधांशु के शब्द हवा में स्थिर हो गए थे— “यदि आवश्यक हुआ तो […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– भोर का पहला प्रकाश अभी क्षितिज पर उभर ही रहा था। हल्की धुंध खेतों के ऊपर तैर रही थी और दूर कहीं बैलों की घंटियों की धीमी आवाज सुनाई दे रही […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– रात का सन्नाटा गहरा था। आकाश में बादल छाये हुए थे और चन्द्रमा कभी-कभी उनके बीच से झाँक जाता था। सुधांशु के घर के आँगन में दीपक की लौ हल्की-हल्की काँप […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– संध्या का समय था। सूर्य पश्चिम दिशा में ढल रहा था और आकाश में लालिमा फैलती जा रही थी। सुधांशु आश्रम की पगडंडी से आगे बढ़ रहा था। उसके कदम धीमे […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– शूद्र गँवार ढोल पशु नारीये ताड़न की अधिकारी है।जाति-पाँति से हीन रहीयुग-युग से वह बेचारी है।बुद्धिमान होकर भी नारीजाहिल समझी जाती है।गैरों का पाप लिए सिर परवह दर-दर ठोकर खाती है।जीवन […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– शीत ऋतु का प्रारम्भ था। प्रातःकाल की धूप अभी कोमल थी और हवा में हल्की ठंडक थी। निरंजन अपने घर के बाहर बैठा था। सामने आँगन में तुलसी के चौरे पर […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– वर्षा का समय समाप्त हो चुका था। आकाश स्वच्छ था और हवा में हल्की शीतलता घुलने लगी थी। संध्या का समय था। निरंजन घर के आँगन में बैठा था। सामने तुलसी […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– शरद की एक गहरी रात्रि थी। आकाश में बादल छाए हुए थे और हवा में एक विचित्र नमी थी। घर के बाहर पीपल के पत्तों की हल्की सरसराहट सुनाई दे रही […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– शरद पूर्णिमा की रात्रि थी। चन्द्रमा का प्रकाश आश्रम की शिला-दीवारों पर शान्त चाँदी-सा बिछा हुआ था। हवा में न शीत का तीखापन था, न वर्षा की नमी—केवल एक निर्मल संतुलन। […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– वर्षा ऋतु का अन्तिम चरण था। आकाश स्वच्छ था, परन्तु वायु में अभी भी जल की शीतलता थी। आश्रम के उत्तर दिशा में एक प्राचीन कक्ष था, जिसे नाद-मण्डप कहा जाता […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– प्रभात का समय था। आश्रम के पीछे बहने वाली छोटी नदी के तट पर निरंजन अकेला बैठा था। जल का प्रवाह शांत था, परन्तु उसके भीतर निरन्तर गति थी। वह उसी […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– लंका अब केवल नगर नहीं थी—वह एक भय-शाला बन चुकी थी। रावण ने सभा में कहा—“अब मेरा पुत्र जाएगा।” इंद्रजीत। जिसने कभी पराजय नहीं देखी थी।जिसके अस्त्र देवताओं को भी चकित […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– गिरना भी भाँति-भाँति का होता है।चलते-चलते गिर जानाकिसी से टकराकर गिर जाना।नैतिकता के आँचल से गिर जाना।और तो और अपनो की नजरों से गिर जाना।लेकिन सबसे निकृष्ट हैअपनी नजरों मे गिर […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– प्रकृति हँसे सबसे कहे, छठा तत्त्व पहचान।नाम प्रेम है उसका, जो दे सबको प्राण॥ठोस तरल ये कुछ नहीं, न दृष्टि न स्पर्श।फिर भी सबमें व्याप्त है, बन जीवन का हर्ष॥प्रेम बिना […]
जो रहना चाहता है दूररहने दे।वो जो करना चाहता हैकरने दे।जो तेरा नहींतेरे पास क्या करेगा?उसे उसके हाल पररहने दे।जिन्दा रखतू अपनी खुद्दारी।जो हो रहा हैउसे होने दे।किरदारों का क्या बंदेआज कुछ और कुछ कल?हँसकर […]
राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी राघव, बालामऊ, हरदोई– जिला परिषद के छोटे से विद्यालय में राजेन्द्र सर अपनी सादगी, ईमानदारी और शांत स्वभाव के कारण सबके प्रिय थे। वे कम बोलते थे, लेकिन हर शब्द सच्चाई से […]