सेतुसमुद्रम : धर्म पहले संवाद करता है और युद्ध बाद में

समुद्र सामने था—
अथाह, गंभीर और चुनौतीपूर्ण।

यह वही समुद्र था
जो रावण के अहंकार की सीमा बन चुका था।

वानर सेना ठिठकी नहीं,
पर प्रश्न था—
“कैसे?”

राम मौन थे।

विभीषण ने सागर से राह माँगने के लिए विनयपूर्ण सलाह दी।

वही विभीषण जो धर्म के पथ का राही था। लंका का कवच था।

अब जब एक ओर विभीषण लंका से दूर हो रहा था तो दूसरी ओर लंका के भीतर अंधकार गहरा रहा था।

विभीषण ने अंतिम बार
सभा में कहा—

“अब भी समय है।”

उसने राम की नीति बताई।

उसने सेतु की बात की।

उसने जनसाधारण के उठ खड़े होने की बात की।

रावण हँसा।

पर यह हँसी खोखली थी।

सभा मौन रही।

विभीषण समझ गया—

जहाँ मौन हो,
वहाँ अधर्म जड़ जमा चुका होता है।

वह सभा से निकला।

यह पलायन नहीं था—
यह चयन था।

वह राम के शिविर पहुँचा।

राम ने उसे शरण दी।

यह क्षण ऐतिहासिक था।

यह संदेश था—

“धर्म किसी जाति, वंश या पक्ष का नहीं होता।”

विभीषण के साथ
राम ने यह स्पष्ट कर दिया—

यह युद्ध
किसी राज्य से नहीं,
किसी व्यक्ति से नहीं—

यह युद्ध
अत्याचार से था।
और अत्याचार
कभी स्थायी नहीं होता।

तीन दिन तक उन्होंने समुद्र से
मर्यादा से निवेदन किया।

यह कोई दुर्बलता नहीं थी,
यह संदेश था—

“धर्म पहले संवाद करता है,
युद्ध बाद में।”

जब समुद्र मौन रहा,
राम ने धनुष उठाया।

उस क्षण समुद्र कांप उठा।

यह भय नहीं था—
यह स्वीकार था।

समुद्र ने मार्ग दिया।

अब सेतु बनना था।

नल-नील आगे आए।

पत्थर उठे।

पहला पत्थर डूबा नहीं।

वानर ठिठक गए।

दूसरा पत्थर भी नहीं डूबा।

अब आश्चर्य नहीं रहा—
अब उत्सव था।

“राम” लिखा गया,
और पत्थर तैरने लगे।

पर यह चमत्कार नहीं था।

यह उस विचार की पुष्टि थी
कि—

जब उद्देश्य धर्म हो,
तो प्रकृति भी सहयोगी बन जाती है।

सेतु बनता गया।

हर पत्थर
एक भय का अंत था।

हर कदम
रावण की सत्ता की ओर।

यह सेतु
केवल लंका तक नहीं गया—
यह जनसाधारण के मन तक पहुँचा।

सेतु पूर्ण हुआ।

राम ने सेना को देखा।

यह वही सेना थी
जो कभी भय से काँपती थी।

अब उनके नेत्रों में
संदेह नहीं था।

युद्ध आरंभ हुआ।

राक्षस सेना आई—
सुसज्जित, प्रशिक्षित, क्रूर।

वानर सेना आई—
साधारण, असंगठित, पर निर्भीक।

पहले आघात में ही
राक्षस चौंके।

“ये भाग क्यों नहीं रहे?”

यह प्रश्न
उनके लिए नया था।

वानरों ने
जैसे वर्षों का भय
एक दिन में उतार फेंका।

वे पत्थर, वृक्ष, पर्वत उठाकर टूट पड़े।

यह युद्ध नहीं था—
यह प्रतिरोध था।

यह वह क्षण था
जब साधारण जन
असाधारण बनता है।

राक्षस मरे—
पर उससे अधिक
उनका दर्प टूटा।

लंका की दीवारें खड़ी थीं,
पर आत्मविश्वास गिर चुका था।

यह युद्ध का पहला दिन था—

और यह स्पष्ट हो चुका था
कि यह युद्ध
रावण नहीं जीत सकता।

लंका के भीतर
अंधकार गहरा रहा था।

विभीषण ने अंतिम बार
सभा में कहा—

“अब भी समय है।”

उसने राम की नीति बताई।

उसने सेतु की बात की।

उसने जनसाधारण के उठ खड़े होने की बात की।

रावण हँसा।

पर यह हँसी खोखली थी।

सभा मौन रही।

विभीषण समझ गया—

जहाँ मौन हो,
वहाँ अधर्म जड़ जमा चुका होता है।

वह सभा से निकला।

यह पलायन नहीं था—
यह चयन था।

वह राम के शिविर पहुँचा।

राम ने उसे शरण दी।

यह क्षण ऐतिहासिक था।

यह संदेश था—

“धर्म किसी जाति, वंश या पक्ष का नहीं होता।”

विभीषण के साथ
राम ने यह स्पष्ट कर दिया—

यह युद्ध
किसी राज्य से नहीं,
किसी व्यक्ति से नहीं—

यह युद्ध
अत्याचार से था और अत्याचार
कभी स्थायी नहीं होता।