विश्वकर्मा जयन्ती के मायने
हमारे समय में यानि 80-90 के दशक तक पढ़ाई का इतना दबाव बच्चों पर नहीं था। विद्यालय जरूर हम नियमित जाते थे लेकिन वहां से घर आने के बाद विद्यालय को लगभग भूल ही जाते […]
हमारे समय में यानि 80-90 के दशक तक पढ़ाई का इतना दबाव बच्चों पर नहीं था। विद्यालय जरूर हम नियमित जाते थे लेकिन वहां से घर आने के बाद विद्यालय को लगभग भूल ही जाते […]
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय– उसकी भूख से बिलबिलाती आँतेँ–अन्तहीन सिलसिला से संवाद करना चाहती हैँ।उसकी चाहत–चीथड़ोँ मे लिपटीँ-चिपटीँ-सिमटीँ;अपनी पथराई आँखेँ पालतीँ;टुकुर-टुकुर ताकतीँ;आँखोँ से झपट लेने की तैयारी करतीँ,मेले-झमेले की गवाह बनकर रह जाती हैँ।उसके अन्तस् […]