भूमि का भार उतारने को भूमिजा का प्रण

क्षत्रिय का धनुष विजय के लिए नहीं बनता। वह उस अंतिम क्षण के लिए बनता है— जब करुणा के सभी उपाय समाप्त हो जाएँ।


चित्रकूट पीछे छूट चुका था। अब वन का स्वरूप बदल रहा था।

यहाँ वृक्ष अधिक विशाल थे। उनकी जटाएँ मानो धरती को आलिंगन करती थीं। लताएँ शताब्दियों पुराने वृक्षों से इस प्रकार लिपटी थीं जैसे समय स्वयं अतीत से चिपका रहना चाहता हो। सूर्य का प्रकाश भी घने पत्तों के बीच से छनकर धरती पर पहुँचता था। वन के भीतर प्रवेश करते ही ऐसा प्रतीत होता था मानो मनुष्य किसी दूसरे लोक में आ गया हो।

किन्तु इस सौन्दर्य के भीतर एक पीड़ा भी थी। वन मौन था। वह स्वाभाविक मौन नहीं था; वह भय का मौन था।

एक दिन प्रातःकाल सीता मंदाकिनी के समान निर्मल एक जलधारा के तट पर बैठी थीं। उनके हाथों में कुछ औषधीय पत्तियाँ थीं जिन्हें वे पहचान रही थीं। तभी उन्होंने देखा—वन के पक्षी सामान्य से अधिक नीचे उड़ रहे थे। बंदरों के झुण्ड बार-बार ऊँचे वृक्षों पर चढ़कर किसी दिशा में देखकर चीख रहे थे। हिरणों के समूह एक स्थान पर ठहरने के स्थान पर निरन्तर दिशा बदल रहे थे।

लक्ष्मण ने धनुष उठाया।

“भाभी! क्या कोई हिंसक पशु निकट है?”

सीता ने दूर तक दृष्टि डाली। फिर अत्यन्त शांत स्वर में बोलीं—

“नहीं लक्ष्मण। यह सिंह या व्याघ्र का भय नहीं है। यदि ऐसा होता तो केवल मृग भागते। यहाँ तो पक्षी भी विचलित हैं, वानर भी, यहाँ तक कि वृक्षों पर बैठे शुक और सारिकाएँ भी एक स्वर में चेतावनी दे रही हैं।”

राम ने विस्मित होकर पूछा—

“सीते! तुमने यह कैसे जाना?”

सीता ने भूमि की मुट्ठी भर धूल उठाई।

उसे अपनी अँगुलियों के बीच धीरे-धीरे गिरने दिया।

फिर बोलीं—

“आर्यपुत्र! पृथ्वी बोलती है। केवल सुनने वाला चाहिए।”

राम मौन रहे।

सीता आगे कहने लगीं—

“देखिए, यह धूल शुष्क नहीं है, किन्तु इसके भीतर जीवन का स्पन्दन कम हो गया है। जब भूमि भयभीत होती है, तब उसका स्पर्श बदल जाता है। वृक्षों की जड़ों में कम्पन आता है। पक्षियों की उड़ान बदल जाती है। जल की गन्ध बदल जाती है।”

उन्होंने समीप के जलाशय की ओर संकेत किया।

“क्या आपने देखा? मछलियाँ बार-बार सतह पर आ रही हैं। कछुए जल के भीतर नहीं टिक रहे। इसका अर्थ केवल वर्षा नहीं है। यह बताता है कि वन के भीतर कहीं भारी अशान्ति चल रही है।”

राम आश्चर्य से उन्हें देखते रहे।


सीता ने मुस्कराकर कहा—

“मैं जनकनन्दिनी अवश्य हूँ, किन्तु उससे पहले भूमिजा हूँ। मेरा जन्म महलों में नहीं, हल की नोक से पृथ्वी की गोद से हुआ है।”

उन्होंने दोनों हथेलियाँ भूमि पर रख दीं।

“माता अपने बालक की धड़कन पहचान लेती है। वैसे ही मैं पृथ्वी की धड़कन पहचानती हूँ।”

कुछ क्षण बाद वे बोलीं—

“वन आज केवल भयभीत नहीं है।

वह सहायता माँग रहा है।”


उसी समय अनेक ऋषि आश्रम में आए।

उनके शरीर कृश थे।

यज्ञोपवीत धूमिल हो चुके थे।

कुछ के कन्धों पर घाव थे।

कुछ की आँखों में वर्षों का अपमान भरा हुआ था।

वे श्रीराम के चरणों में गिर पड़े।

उनमें से एक वृद्ध ऋषि बोले—

“रघुनन्दन! अब तप नहीं बच रहा। यज्ञ नहीं बच रहे। हमारे आश्रम नहीं बच रहे। हम अपने लिए नहीं आए। इस वन के भविष्य के लिए आए हैं।”

उन्होंने दूर पड़े अस्थिपंजरों की ओर संकेत किया। “ये किसी पशु की हड्डियाँ नहीं हैं। ये उन तपस्वियों के शरीर हैं जिन्हें राक्षसों ने यज्ञवेदी से उठाकर खा लिया।” वन में एक भयानक निस्तब्धता छा गई।


सीता उन अस्थियों के समीप गईं। घुटनों के बल बैठ गईं। उन्होंने एक अस्थि को अत्यन्त श्रद्धा से उठाया। कुछ क्षण उसे देखती रहीं। फिर उनकी आँखें बंद हो गईं। जब उन्होंने नेत्र खोले, उनमें करुणा नहीं—

अग्नि थी।

उन्होंने अत्यन्त धीमे स्वर में कहा—

“यह केवल एक ऋषि की अस्थि नहीं है।

यह धर्म का अपमान है।

यह पृथ्वी के वक्ष पर बना हुआ घाव है।”

राम ने पहली बार सीता के स्वर में ऐसी कठोरता सुनी।


रात्रि हुई।

अग्नि प्रज्वलित थी।

राम, लक्ष्मण और सीता अग्नि के समीप बैठे थे।

लम्बे मौन के पश्चात् सीता ने स्वयं बात आरम्भ की।

“आर्यपुत्र!

क्या करुणा का अर्थ यह है कि अधर्म को बढ़ने दिया जाए?”

राम ने उत्तर दिया—

“नहीं सीते।”

सीता ने दूसरा प्रश्न किया—

“क्या अहिंसा का अर्थ यह है कि निर्दोषों की हत्या देखते रहें?”

राम ने कहा—

“नहीं।”

सीता अब पूर्ण तेजस्विता से बोलीं—

“तब आज मैं आपसे एक प्रार्थना नहीं—

एक धर्मयाचना करती हूँ।

इस वन का दुःख समाप्त कीजिए।”


उन्होंने आगे कहा—

“मैं नारी हूँ। मेरे स्वभाव का मूल करुणा है। किन्तु करुणा का अर्थ कायरता नहीं होता। जहाँ एक निर्दोष बालक भय में जी रहा हो, जहाँ तपस्वियों का रक्त यज्ञकुण्डों में बहाया जा रहा हो, जहाँ स्त्रियाँ अपने पतियों की अस्थियाँ चुन रही हों, वहाँ शस्त्र उठाना हिंसा नहीं—

करुणा का सर्वोच्च रूप है।”


सीता उठ खड़ी हुईं।

वन की ओर संकेत करते हुए बोलीं—

“आर्यपुत्र!

यह वन आपका राज्य नहीं है।

फिर भी यह आपकी जिम्मेदारी है।

क्योंकि धर्म की सीमा राज्य की सीमा से बड़ी होती है।

राजा केवल अपनी प्रजा का रक्षक नहीं होता।

जहाँ कोई भी प्राणी भयभीत हो—

वहाँ उसका धर्म आरम्भ हो जाता है।”


उन्होंने आगे कहा—

“क्षत्रिय का धनुष विजय के लिए नहीं बनता। वह उस अंतिम क्षण के लिए बनता है— जब करुणा के सभी उपाय समाप्त हो जाएँ।”


राम उठे।

उन्होंने धनुष अपने हाथ में लिया।

कुछ क्षण उसे निहारा।

फिर सीता की ओर देखकर बोले—

“सीते!

आज तुमने मुझे स्मरण कराया कि मैं केवल दशरथ का पुत्र नहीं हूँ।

मैं धर्म का सेवक हूँ।

मैं प्रतिज्ञा करता हूँ—

जब तक इस वन से अधर्म का अन्धकार दूर नहीं हो जाएगा,

तब तक यह धनुष विश्राम नहीं करेगा।”


ऋषियों की आँखों से अश्रु बह निकले।

लक्ष्मण ने अपना धनुष उठाकर कहा—

“भैया!

आज से यह वन अकेला नहीं है।”


उस रात्रि दण्डकारण्य में पहली बार भय से अधिक आशा का जन्म हुआ।

वन के वृक्षों ने जैसे गहरी साँस ली।

दूर कहीं एक मयूर ने पंख फैलाए।

और भूमिजा सीता ने आकाश की ओर देखकर मन-ही-मन कहा—

“माते पृथ्वी! धैर्य रखो। तुम्हारे घाव अब अधिक दिनों तक खुले नहीं रहेंगे।”