डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
दण्डकारण्य में प्रवेश करते-करते अनेक सप्ताह बीत चुके थे। अब वन ने इन तीनों यात्रियों को स्वीकार कर लिया था। जहाँ पहले पक्षी उड़ जाते थे, अब वे समीप बैठ जाते। जहाँ मृग दूर से भाग खड़े होते थे, अब निश्चिन्त होकर सीता के समीप चरने लगते। वन की लताएँ उनके चरणों को छूती हुई प्रतीत होतीं और प्रातःकाल की ओस मानो उनके स्वागत में पुष्पों पर मोतियों की माला बनकर ठहर जाती।
एक दिन प्रातःकाल सीता नदी के तट पर औषधीय वनस्पतियाँ एकत्र कर रही थीं। उनके साथ कुछ वनवासी स्त्रियाँ भी थीं। वे आश्चर्य से देख रही थीं कि राजमहल में पली हुई यह स्त्री वन की प्रत्येक पत्ती का परिचय ऐसे जानती है जैसे कोई माँ अपने बच्चों को पहचानती है।
एक वृद्ध भीलनी ने पूछा— माते! आपने यह सब कहाँ सीखा? क्या मिथिला में भी ऐसे वन थे?
सीता ने मुस्कराकर भूमि को स्पर्श किया। यह ज्ञान किसी गुरुकुल से नहीं मिला, माता। यह पृथ्वी ने दिया है। जो पृथ्वी को केवल चलने का मार्ग समझता है, वह उसके रहस्य कभी नहीं जान पाता। पर जो उसके स्पर्श को सुनता है, वह उसके मौन को भी पढ़ लेता है।
उन्होंने एक छोटी-सी पत्ती उठाई। देखो, यह अपामार्ग है। यह विषहर है। सर्पदंश में इसका लेप प्राण बचा सकता है। फिर उन्होंने एक वृक्ष की छाल दिखाई। यह अर्जुन है। इसका काढ़ा हृदय को बल देता है।
उन्होंने जलाशय के किनारे उग रही एक छोटी घास की ओर संकेत किया— “और यह कुश… केवल यज्ञ की सामग्री नहीं है। इसकी जड़ें भूमि को बाँधती हैं। जहाँ कुश बची रहती है, वहाँ वर्षा का जल भी ठहरता है।”
वनवासी स्त्रियाँ विस्मय से उन्हें देखती रहीं।
कुछ दिनों में यह क्रम नियमित हो गया। प्रत्येक संध्या वन की स्त्रियाँ सीता के पास एकत्र होने लगीं। कोई औषधि पूछती। कोई बालकों के पालन का उपाय।कोई रोग का उपचार। कोई परिवार का विवाद।
सीता सबको धैर्यपूर्वक सुनतीं। किन्तु वे केवल समाधान नहीं देती थीं। वे सोचने की दिशा देती थीं। एक दिन एक युवती रोती हुई आयी। उसके पति को राक्षस उठा ले गए थे। वह बोली— अब मैं किसके लिए जीवित रहूँ?
सीता ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया। बहुत देर तक कुछ नहीं बोलीं। फिर धीरे-धीरे कहने लगीं— पुत्री! जीवन किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं होता। यदि तुम्हारा जीवन केवल तुम्हारे पति तक सीमित होता, तो तुम्हारा जन्म पृथ्वी पर नहीं, उनके हृदय में हुआ होता।
पृथ्वी ने तुम्हें इसलिए जन्म दिया है कि तुम अनेक जीवनों का सहारा बनो। युवती रोती रही। सीता ने उसके आँसू पोंछे। दुःख को अपने भीतर कैद मत करो। उसे सेवा में बदल दो। यही तप है।
एक दिन लक्ष्मण ने देखा कि आश्रम के पीछे खुली भूमि में सीता कुछ वनवासी कन्याओं को बाँस के डण्डों से अभ्यास करा रही हैं।
उन्होंने आश्चर्य से पूछा— भाभी! यह क्या?
सीता मुस्करायीं।
लक्ष्मण! जो अपने घर की रक्षा नहीं कर सकता, वह धर्म की रक्षा कैसे करेगा?
लक्ष्मण बोले— लेकिन क्या स्त्रियाँ शस्त्र चलाएँगी?
सीता ने गंभीर होकर उत्तर दिया— शस्त्र का अर्थ हत्या नहीं होता। शस्त्र का पहला प्रयोजन भय को समाप्त करना है। जो नारी स्वयं निर्भय होगी, वही आने वाली पीढ़ियों को निर्भय बना सकेगी।
तत्पश्चात उन्होंने एक बालिका के हाथ में बाँस का दण्ड दिया और कहा कि शक्ति का उपयोग क्रोध में मत करना। केवल रक्षा के लिए करना। यही धर्म है।
दूर खड़े राम यह दृश्य देख रहे थे। उनके मुख पर गम्भीर संतोष था।
कुछ समय बाद तीनों महर्षि अगस्त्य के आश्रम पहुँचे। अगस्त्य ने राम का स्वागत किया, पर उनकी दृष्टि बार-बार सीता पर ठहर रही थी।
उन्होंने कहा— रघुनन्दन! तुम्हारे साथ जो चल रही हैं, वे केवल सहधर्मिणी नहीं हैं। इनका तेज पृथ्वी के धैर्य के समान है।
फिर उन्होंने सीता से पूछा— देवि! तुम इस वन में सबसे बड़ी समस्या क्या देखती हो? राम और लक्ष्मण भी उत्तर सुनने को उत्सुक थे।
सीता ने बिना विलम्ब कहा– वन की सबसे बड़ी समस्या राक्षस नहीं हैं।
अगस्त्य मुस्कराए।
“तो फिर?”
सीता बोलीं— भय। जहाँ भय बस जाता है, वहाँ मनुष्य खेती छोड़ देता है। यज्ञ छोड़ देता है। शिक्षा छोड़ देता है। सृजन छोड़ देता है। राक्षस बाद में आते हैं। पहले भय आता है।
अगस्त्य ने प्रसन्न होकर कहा, आपका कथन सत्य है। भय ही अधर्म का प्रथम दूत है।
एक सन्ध्या सीता अकेली नदी के किनारे बैठी थीं। आकाश निर्मल था। फिर भी उन्हें एक अनजाना बोझ अनुभव हुआ।
उन्होंने देखा— सामान्य दिनों में पश्चिम की ओर उड़ने वाले हंस आज उत्तर की ओर जा रहे थे। वन के हाथी असामान्य रूप से चुप थे। एक वृद्ध वटवृक्ष की सूखी शाखा बिना हवा के टूटकर गिर पड़ी। जल में तैरती मछलियाँ बार-बार गोल चक्कर काट रही थीं।
सीता ने धीरे से पृथ्वी को स्पर्श किया। उनकी आँखें बन्द हो गईं। कुछ क्षण बाद उन्होंने स्वयं से कहा—
माता… यह केवल ऋतु का परिवर्तन नहीं है। कोई ऐसी छाया इस वन की ओर बढ़ रही है, जो छल से आती है। जिसका रूप सुंदर होगा, पर उद्देश्य विनाश होगा।
उनके हृदय में पहली बार एक अकारण कंपन उठा। उन्होंने दूर बैठे राम की ओर देखा। उनकी आँखों में करुणा थी। पर उसी करुणा के भीतर एक अदृश्य चिंता भी जन्म ले चुकी थी।
उन्हें अभी ज्ञात नहीं था कि प्रकृति जिस संकेत को पढ़ रही है, वह भविष्य में स्वर्णमृग, मारीच और लंका तक जाने वाली एक महागाथा का प्रारम्भ है। किन्तु भूमिजा का हृदय उसे सुन चुका था।
उस रात्रि सीता ने तारों की ओर देखते हुए मन-ही-मन कहा—
“यदि संकट आना ही है, तो वह मुझ पर आए; पर धर्म पर नहीं। यदि किसी को अग्नि में प्रवेश करना पड़े, तो मैं करूँ; पर मर्यादा जीवित रहनी चाहिए। क्योंकि व्यक्ति नष्ट हो सकता है, धर्म नहीं।”
… और उसी क्षण, मानो आकाश ने उनकी मौन प्रतिज्ञा सुन ली।