गीत : विष आलिंगन में खुश रहना, यह मैंने चंदन से सीखा

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी-


सोने जैसा खरा नही हूँ ।
पर इतना भी बुरा नही हूँ ।

मुद्दों को मत मीत बनाओ ,
मत राई को मेरु बनाओ।
मेरे घाव बहुत दुखते हैं,
मत खंजर से दवा लगाओ।

अभी रुको ,मत खुशी मनाओ,
बस घायल हूँ , मरा नही हूँ ।
पर इतना भी ………………

रुक्षभूमि पर कुटज सरीखा।
ज्वर की औषधि जैसा तीखा।
विष आलिंगन में खुश रहना,
यह मैंने चंदन से सीखा ।

पकी फसल सा सूख गया हूँ,
मैं जवास सा हरा नही हूँ ।
पर इतना भी………………..

(मेरु = मेरुगिरि पर्वत ,रुक्षभूमि=ऊबड़ खाबड़ जमीन, कुटज=एक औषधीय पौधा,जवास=एक पौधा जो पहला पानी गिरते ही अन्य पौधो को हरा होते देखकर सूख जाता है )