● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
मुट्ठी तान लो!
मरी हुईं अँगुलियों के इर्द-गिर्द
मक्खियाँ भिनभिनाती हैं।
पुरुषार्थ के अंगारे को चूम लो!
राख मे दबी हुई चिनगारी को
अलसाने मत दो।
हर खेत मे,
चिनगारी की सुगबुगाहट बो दो।
हवा अपना रास्ता
ख़ुद-ब-ख़ुद तलाश लेगी;
पानी की सम्भावना दम तोड़ देगी।
समय के सीने पर,
किये हुए तुम्हारे हस्ताक्षर
जीवन्त हो उठेंगे।
आदर्श और यथार्थ के मध्य,
जो एक रेतीली रेखा सरक रही है,
वह तुम्हारे पंकिल विचारों को
रेतने के लिए आतुर है।
इससे पहले कि
सर्जन से विसर्जन तक की अनथक यात्रा,
विभ्रम का प्रवास बन जाये,
एक ऐसे निवास का निर्माण कर लो,
जहाँ का सब कुछ तुमसे होकर ग़ुज़रे
और तुम अनासक्ति-आसक्ति के साक्षी बनते दिखो।
सम्पर्क-सूत्र
‘सारस्वत सदन’
२३५/११०/२-बी, अलोपीबाग़
प्रयागराज– २११ ००६
यायावरभाषक-संख्या :– ८७८७००२७१२