डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
“विद्या परमं धनम्।” — यह केवल एक सूक्ति नहीं, अपितु भारतीय सभ्यता की आत्मा है। मानव इतिहास में यदि किसी संस्कृति ने ज्ञान को सत्ता, संपत्ति और सामर्थ्य से ऊपर स्थान दिया है, तो वह भारतवर्ष ही है। यहाँ विद्या को न तो केवल आजीविका का साधन माना गया, न ही बौद्धिक विलास का उपकरण; बल्कि विद्या को आत्मोद्धार, लोककल्याण और धर्म की प्रतिष्ठा का माध्यम माना गया है। इसीलिए भारतीय मनीषा में विद्या का मूल्य उसके परिणाम से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य से आँका गया।
आधुनिक युग में ज्ञान को अक्सर सूचना और कौशल तक सीमित कर दिया गया है। परन्तु शास्त्रों में विद्या का अर्थ इससे कहीं व्यापक है। विद्या वह है जो अज्ञान का नाश करे— “सा विद्या या विमुक्तये।” (विष्णुपुराण)
अर्थात् वही विद्या है, जो बंधनों से मुक्त करे। यहाँ बंधन केवल बाह्य नहीं, बल्कि राग, द्वेष, अहंकार, मोह और अविद्या जैसे आंतरिक विकार हैं। उपनिषदों ने इसीलिए अविद्या और विद्या का भेद स्पष्ट किया— “अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते।” (ईशावास्य उपनिषद्)
अविद्या से मनुष्य केवल जीवन-यापन करता है, पर विद्या से वह अमृतत्व को प्राप्त करता है। इस अमृतत्व का अर्थ देह की अमरता नहीं, बल्कि चेतना की पूर्णता है।
भारतीय परम्परा में ज्ञान का अर्जन केवल पुस्तकों के अध्ययन से नहीं होता। श्रवण, मनन और निदिध्यासन — ये तीन सोपान माने गए हैं। गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं— “श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।” (भगवद्गीता 4.39)
श्रद्धा, संयम और तत्परता — ये तीनों ज्ञान के अनिवार्य उपकरण हैं। यहाँ श्रद्धा अंधविश्वास नहीं, बल्कि सत्य के प्रति विनम्रता है। संयम का अर्थ केवल इन्द्रिय-निग्रह नहीं, बल्कि विचारों की अनुशासनबद्धता है।
विद्या का वास्तविक परीक्षण उसके आचरण में होता है। मनुस्मृति स्पष्ट कहती है— “आचारः परमो धर्मः।”
अर्थात् आचरण ही धर्म का सर्वोच्च रूप है। जो विद्या जीवन में करुणा, संयम और न्याय उत्पन्न न करे, वह विद्या नहीं, केवल सूचना है।
भौतिक धन का व्यय उसे घटाता है, पर विद्या का व्यय उसे बढ़ाता है। यह भारतीय दर्शन का विलक्षण बोध है। दान की परम्परा भी इसी से जुड़ी है। ज्ञानदान को सभी दानों में श्रेष्ठ कहा गया— “सर्वदानात् ज्ञानदानं विशिष्यते।” जब विद्या बाँटी जाती है, तो वह विभाजित नहीं होती, अपितु विस्तृत होती है। गुरु-शिष्य परम्परा इसी सिद्धांत पर आधारित है। गुरु ज्ञान देकर रिक्त नहीं होता, बल्कि पूर्ण होता है।
भारतीय शास्त्रों में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर बताया गया है। यह भावनात्मक अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि दार्शनिक सत्य है। क्योंकि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग गुरु ही दिखाता है— “तद्विज्ञार्थं गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्।” —मुण्डकोपनिषद्
यहाँ गुरु को श्रोत्रिय (शास्त्रज्ञ) और ब्रह्मनिष्ठ (अनुभवयुक्त) कहा गया है। अर्थात् केवल पुस्तकज्ञानी नहीं, अपितु आचरण में स्थित पुरुष ही सद्गुरु है। रामायण और महाभारत दोनों में गुरु की भूमिका निर्णायक है— राम के लिए वशिष्ठ, कृष्ण के लिए सांदीपनि, अर्जुन के लिए द्रोण और फिर स्वयं कृष्ण। बिना गुरु के ज्ञान अहंकार बन सकता है। इसलिए गुरु ज्ञान को विनय से जोड़ता है।
विद्या का लक्ष्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं है। यदि ज्ञान केवल स्वार्थ साधन बन जाए, तो वह विनाश का कारण भी बन सकता है। रावण इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। वह वेदों का ज्ञाता था, शिव-भक्त था, पर ज्ञान लोकहित से विहीन था, इसलिए वह अधर्म का प्रतीक बन गया। इसके विपरीत, जनक, विदुर और भीष्म जैसे पात्र ज्ञान को धर्म और समाज के साथ जोड़ते हैं। महाभारत में विदुर कहते हैं— “धर्मेण अर्थं आप्नुयात्।”
अर्थात् अर्थ और सत्ता भी धर्म से ही प्राप्त होनी चाहिए। ज्ञान यदि लोककल्याण से कट जाए, तो वह केवल चतुराई रह जाता है। भारतीय परम्परा में भाग्य से अधिक पुरुषार्थ पर बल दिया गया है। चार पुरुषार्थ — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इसी दृष्टि के परिचायक हैं। परन्तु इन चारों का आधार पुरुषार्थ ही है।
गीता में श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं— “न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।” (गीता 3.5)
अर्थात् कोई भी व्यक्ति बिना कर्म किए नहीं रह सकता। सफलता कोई आकस्मिक चमत्कार नहीं, बल्कि निरन्तर अभ्यास का फल है। पतंजलि योगसूत्र में भी कहा गया—
“दीर्घकाल नैरन्तर्य सत्कारासेवितो दृढभूमिः।
अर्थात् दीर्घकाल तक निरन्तर और श्रद्धापूर्वक किया गया अभ्यास ही सिद्धि देता है। योग केवल आसन नहीं, बल्कि जीवन की पद्धति है। योगी वर्षों तपस्या करता है, क्योंकि वह जानता है कि शिखर पर पहुँचने का कोई शॉर्टकट नहीं होता। यह बात सांसारिक जीवन पर भी समान रूप से लागू होती है।
राजा हरिश्चंद्र, नचिकेता, ध्रुव — ये सभी पात्र हमें बताते हैं कि कठिनाइयाँ साधना की अग्नि हैं, जो व्यक्ति को तपाकर शुद्ध करती हैं। आत्मबल का अर्थ अहंकार नहीं, बल्कि आत्मविश्वास है। उपनिषदों का उद्घोष है— “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।” —मुण्डकोपनिषद्
जो स्वयं पर विश्वास नहीं करता, वह ईश्वर को भी नहीं पा सकता। आत्मबल ही वह शक्ति है, जो विपरीत परिस्थितियों में मनुष्य को अडिग रखती है। हनुमान इसका आदर्श उदाहरण हैं। जब तक उन्हें अपनी शक्ति का स्मरण नहीं कराया गया, तब तक वे संकोच में रहे। पर स्मरण होते ही उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया।
भारतीय दर्शन में संकल्प को अत्यंत महत्त्व दिया गया है। परन्तु संकल्प तभी फलित होता है, जब वह शुभ हो— “सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा।”
संकल्प यदि केवल स्वार्थ से प्रेरित हो, तो वह सीमित फल देता है। पर यदि वह लोकहित से जुड़ा हो, तो ईश्वर स्वयं उसमें सहायक बन जाते हैं। राम का वनगमन, बुद्ध का महाभिनिष्क्रमण, महावीर का तप — ये सभी लोककल्याण से प्रेरित संकल्प थे।
शास्त्र अंध-आदर्शवाद का समर्थन नहीं करते। वे यथार्थ को स्वीकार करने की शिक्षा देते हैं। गीता का कर्मयोग इसी का उदाहरण है—कर्तव्य करो, फल की आसक्ति छोड़ो। आत्ममुग्धता से दूर रहना, अपनी सीमाओं को पहचानना, और व्यावहारिक योजना बनाना — यही विवेक है। विवेक के बिना ज्ञान भी खतरनाक हो सकता है। अंततः, विद्या का उद्देश्य केवल व्यक्ति को सफल बनाना नहीं, बल्कि समाज को समरस बनाना है। ज्ञान यदि अहंकार बढ़ाए, तो वह विनाश का कारण बनता है; यदि विनय और करुणा बढ़ाए, तो वह संस्कृति का आधार बनता है।
भारतीय परम्परा हमें यही सिखाती है कि— विद्या वह दीप है, जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है। आज के युग में, जब ज्ञान को केवल बाज़ार की वस्तु बना दिया गया है, तब इस शास्त्रीय दृष्टि की पुनर्स्थापना अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि बिना विद्या के मनुष्य जीवित तो रह सकता है, पर उत्कृष्ट नहीं बन सकता।