बदलता समय

राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’-


राघवेन्द्र कुमार “राघव”
प्रधान संपादक, इण्डियन वॉयस 24

अब तो अपनी शख़्सियत ही

इम्तेहान लेती है।

हर दिन कुछ न कुछ

नयी बात होती है।

ज़ेहन में ख़यालात की आंधी

बढ़ती चली आती है।

विचारों के द्वंद्व में

कुछ नयी बात होती है।

हम चाहते तो हैं कि

अलग हो जाएं दुनिया से।

क्या करें यह दुनिया ही

पल-पल साथ देती है।

सोचते हैं बार-बार

क्यों न कुछ नया कर दें?

किन्तु अन्तर्मन में हमेशा

पुरानी बात होती है।

गुड्डे-गुड़ियों के खेल से

कब इतनी दूर आ गये?

अब देखते हैं जब पीछे

वहाँ तनहाइयाँ थिरकती हैं।

घर से कॉलेज के लिए

जिस राह मैं जाता था।

उस पथ की ईंट-ईंट अब

मेरी राह देखती है।

माँ गंगा के तट पर वह

माह कार्तिक का पावन डेरा।

गंगा मइया की धार सबसे

मेरा हाल पूछती है।

क्या इतना बदल गया हूँ

इंसान होकर के मैं ?

मेरी माँ ही आज मुझसे

मेरा पता पूछती है।।