- चेरी के फूल
उपवन से चार पांच
चेरी के पौधे लेकर
आऊंगा फिर तुम
अपने कोमल हाथों
से घर के ऑंगन
में लगा देना
उनको रोज सुबह
नीर में पिला दूंगा
वो आहिस्ता से
फिर बड़े हो जायेंगे
पश्चात उनमें फूल
निकल आयेंगे
जिससे अपने गृह को
सतायेंगे मिलकर दोनों
कुछ फूल तुम अपने
घने सुनहरी बालों
में लगा लेना
बहुत खूबसूरत लगेंगे
चेरी के महकते
फूल तुम्हारे
बालों में
2.रेल का डिब्बा
प्रभा को स्टेशन पर
रेल आती है छुक-छुक
की आवाज लगाती हुई
चंद पल ठहरती है
फिर सीटी बजाती
हुई अम्बर में
धुंआ छोड़कर
निकल जाती है
टीटी झंडा लहराता
रहता है उसके
निकलने के बाद भी
पटरियों से सन – सन
की ध्वनि निकलती
है कुछ पल
के वास्ते
आखिर का डिब्बा
वह छोड़कर
चली जाती है
उसका कसूर क्या
है जो उसे तन्हा
छोड़कर वह
छुपके से निकल
जाती है
3.ये जाड़े के दिन
ये जाड़े के दिन
सुहाने लगते है
जब छत की मुन्डेर
पर कबूतर अपने
पंख सेकते है
ये जाड़े के दिन
सुहाने लगते है
जब सुबहा खेतों
में दूर तक
कोहरा बिखरा
हुआ रहता है
ये जाड़े की दिन
सुहाने लगते है
जब सरसों के
फूलों पर रंग-बिरंगी
तितलियां मंडराती
फिरती है
ये जाड़े के दिन
सुहाने लगते हैं
जब जलती आंच
पर कपकपाते
हाथ सेकते है
4.धूंप निकल आई है
काली बदली टूट
कर बिखरी गई है
फिर होले से
गुनगुनी धूॅंप
निकल आई है
छत के ऊपर
भीगे हुए कपड़े
एक लम्बी सी
डोरी पर डालकर
सूखने की बाट में
सांझ उतर आती है
होले से कपड़ो के
गीले अधरों पर
रात को फिर
बल्ब की उष्मा में
रखकर मूंद
देते है आहिस्ता
से किवाड़ो को
5.झील पर उड़ते परिंदे
झील पर उड़ते परिंदों
को देखता हूं तो
सोचता हूं
ये नाप रहें होंगे
जल की गहराई को
नीचे कितना गहरा
है नीर इनको
तो मालूम होगा सब
पहाड़ो पर बैठे
बादलों को देखता
हूं तो सोचता हूं
वह तो जानते होंगे
उनकी ऊंचाइयों को
फूलों पर मंडराते
भंवरों को देखता हूं
तो सोचता हूं
वह तो जानते
होंगे उनके ह्रदय
की बातें
निहाल सिंह
झुंझुनूं, राजस्थान
ये रचनाएं मौलिक एवं स्वरचित है।