● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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दीपवर्तिका की ज्वलनशीलता
लोकमानस की सहनशीलता
पृथक्-पृथक् पथ पर परिलक्षित होती हैँ।
दो समानान्तर दूरी पर चलते हुए भी
संवाद करने के लिए कहीँ-कोई ठौर नहीँ बचता।
किस हेतु लोक दीप जलाता है
ख़ुश हो लेता है?
दीप-प्रज्वलन के निहितार्थ से नितान्त परे रहकर।
प्रतिस्पर्द्धा का नग्न प्रदर्शन
पर्यावरण का आर्त स्वर
निष्प्रभ आत्मिकता की ज्योति
भौतिकता की दीपमाला चहुँ ओर बिखरती है
मन-प्राण-आत्मा इन सबसे पृथक् और परे
स्नेह, सौजन्य, सहानुभूति
सदाशयता की बाट जोहते रह जाते हैँ।
सजधज कर
एक और दीपावली आती है
और छोड़ जाती है
मरहम की तलाश मे
भटकते लगे घावोँ को।
नियति मुसकराती है
मानव की अर्थहीन और भावहीन उत्सवधर्मिता पर!
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