डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में चल रही वीटो पर बहस में भारत ने एक बार फिर सुधारों की सबसे बड़ी बाधा पर सीधा प्रहार किया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की पूर्ण बैठक (प्लेनरी) और इंटर-गवर्नमेंटल नेगोसिएशन (IGN) में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पी. हरीश ने कहा – “वीटो एक अत्यंत गंभीर जिम्मेदारी है, न कि संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ साधने का कोई साधन।”
एक्स पर अपने संबोधन की क्लिप साझा करते हुए हरीश ने 7 बिंदुओं में भारत का पक्ष रखा।
आंकड़े क्या कहते हैं – हरीश का दावा सही
राजदूत हरीश ने कहा था कि P5 में से दो देशों ने साढ़े तीन दशक से एक बार भी वीटो का इस्तेमाल नहीं किया है, जबकि अधिकांश वीटो या वीटो की धमकी तीन देशों से आती है।
सिक्योरिटी काउंसिल रिपोर्ट के आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं:
- 1946 से दिसंबर 2025 तक कुल 320 बार वीटो का इस्तेमाल 264 ड्राफ्ट प्रस्तावों पर हुआ है।
- सोवियत संघ/रूस: 155 बार, अमेरिका: 94 बार, ब्रिटेन: 30 बार, चीन: 21 बार, फ्रांस: 18 बार।
- ब्रिटेन और फ्रांस ने 23 दिसंबर 1989 के बाद से एक भी वीटो नहीं किया है – यानी 36 साल से अधिक। यह ठीक वही अवधि है जिसका जिक्र हरीश ने किया।
हालिया प्रवृत्ति और खतरनाक है:
1990 के दशक में केवल 10 प्रस्ताव वीटो हुए – इतिहास में सबसे कम। लेकिन 2015 से 2024 के बीच 37 प्रस्तावों पर 47 वीटो पड़े, जबकि 1990-2014 के 24 साल में केवल 30 प्रस्तावों पर 36 वीटो हुए थे।
2014-2024 की अवधि में 47 में से 29 वीटो अकेले रूस ने किए – कुल का 62%, 11 चीन ने और 7 अमेरिका ने।
राजदूत हरीश के 5 बड़े बयान—
UNGA में दिए गए बयान में हरीश ने कहा:
1. Veto is a responsibility, not a tool of narrow political expediency. We note that two of the P5 have not exercised veto for over three and a half decades. Most vetoes or threats of vetoes have emanated from three of the P5.
2. Piecemeal reforms will not work. All five clusters of UNSC reform must be addressed together. – यानी सदस्यता की श्रेणियां, वीटो का प्रश्न, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, विस्तारित परिषद का आकार और कार्यप्रणाली – पांचों पर एक साथ काम हो।
3. Veto initiative of 2022 was seen as a harbinger of change. However, actual record of large number of vetoes cast since UNGA 76/262 tells a contrary story. – 2022 में पास हुआ प्रस्ताव 76/262 कहता है कि जब भी वीटो लगे, 10 दिन में महासभा में बहस होगी। भारत का कहना है, इसके बावजूद वीटो कम नहीं हुए।
4. Unwritten consensus rules enable de facto vetoes in Council decisions and sanctions committees. – भारत ने कहा वर्तमान आम सहमति का अलिखित नियम ही ‘छिपे हुए वीटो’ के रूप में काम कर रहा है, जो प्रतिबंध समितियों को बाधित करता है।
5. New long-term seats without veto powers would create second-class members. भारत ने बिना वीटो वाले नए स्थायी सदस्यों के प्रस्ताव को दूसरे दर्जे की सदस्यता बताया।
भारत का सैद्धांतिक स्टैंड क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत का तर्क है कि 1965 में जब सुरक्षा परिषद का एकमात्र विस्तार हुआ, तब अस्थायी सदस्यों की संख्या 6 से बढ़ाकर 10 की गई, जबकि 5 स्थायी सदस्य वही रहे। इससे स्थायी और अस्थायी का अनुपात 5:6 से बदलकर 5:10 हो गया और P5 की ताकत और बढ़ गई।
भारत, जी4 (भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान) और अफ्रीका के साथ मिलकर कह रहा है कि जब तक वीटो है, तब तक सभी स्थायी सदस्यों को समान अधिकार मिलने चाहिए।
भारत का कहना है कि उसकी मजबूत अर्थव्यवस्था, 140 करोड़ से अधिक आबादी और संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सबसे बड़ा योगदान उसे 1945 की नहीं, 2026 की वास्तविकता के आधार पर स्थायी सदस्यता का हकदार बनाता है।