● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ••••••••••••••••••••••••••••••••••••• मुट्ठी तान लो!बायेँ हाथ की अँगुलियाँ भीहथेली से एक साथ जुड़ना चाहती हैँ।मरी हुईँ अँगुलियोँ के इर्द-गिर्दमक्खियाँ भिनभिनाती हैँ।पुरुषार्थ के अंगारे को चूम लो!राख मे दबी हुई चिनगारी कोअलसाने […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मुट्ठी तान लो!मरी हुईं अँगुलियों के इर्द-गिर्दमक्खियाँ भिनभिनाती हैं।पुरुषार्थ के अंगारे को चूम लो!राख मे दबी हुई चिनगारी कोअलसाने मत दो।हर खेत मे,चिनगारी की सुगबुगाहट बो दो।हवा अपना रास्ताख़ुद-ब-ख़ुद तलाश […]
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