प्रेमचंद पुस्तकालय में सजाकर रखे जाने वाले नहीं बल्कि खरीदकर पढ़े जाने वाले लेखक है। वैसे तो हिंदी साहित्य में एक से बढ़कर एक लेखक, कवि, गीतकार, आलोचक आदि हुए हैं। प्राचीन और मध्यकालीन साहित्य को छोड़ भी दें तो आधुनिक साहित्य में भी निराला, पंत, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद जैसे अनेकों लेखक हैं जिनका नाम साहित्यप्रेमी बड़े सम्मान और आदर से लेते हैं।
बड़ी कक्षाओं में हिंदी साहित्य पढ़ने वाले छात्रों की बात मैं नहीं कर रहा। जिन छात्रों ने हाई स्कूल, इंटरमीडिएट तक भी हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ी है, वह भी इन स्वनामधन्य साहित्यकारों से जरूर परिचित होंगे। उनकी रचनाओं को अवश्य ही पढ़ा होगा। इन प्रतिष्ठित लेखकों का छायावाद, रहस्यवाद आकर्षित करता है। उनकी संस्कृतनिष्ठ भाषा गौरवबोध जागृत करती है, क्लिष्ट छंदों और रागों में लिखी कविता आह-वाह करने को मजबूर करती है। जयशंकर प्रसाद का इतिहास का गौरव गान, पंत का प्रकृति प्रेम, निराला की हृदय विदारक आत्मव्यथा ‘सरोज स्मृति’ और महादेवी वर्मा का संस्मरण ‘गुल्लू’ पढ़कर कौन सहृदय पाठक भावुक नहीं हुआ होगा। फिर भी मेरा विश्वास है कि पाठ्यक्रम, किसी विशेष प्रयोजन, शोध कार्य के अलावा बहुत ही कम लोगों ने इन लेखकों की किताबें अपने पैसे से खरीद कर पढ़ी होंगी। पुस्तकालय से लाकर पढ़ने को भी मैं फिलहाल इसी श्रेणी में रखना पसंद करूंगा।
परंतु कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद इस मामले में विशिष्ट हैं, अनोखे हैं। मेरे जैसे तमाम शौकिया साहित्य प्रेमियों ने प्रेमचंद की किताबें अपने पैसे से खरीदी हैं, उन्हें बार-बार पढ़ा है। परीक्षा के लिए नहीं, शोध के लिए नहीं, ज्ञान के लिए भी नहीं। बल्कि इसलिए कि वह हमारी बोली में, हमारी भाषा में हमारे समाज, गांव, परिवार की बात करते हैं। उनके पात्र हमारे आस पास के हैं, खूब जाने पहचाने से हैं। कई बार तो हम खुद ही हैं। वह पात्रों को कृत्रिम रूप से गढ़ते नहीं हैं बल्कि हमारे आस-पास के ही किसी व्यक्ति को बस स्वर प्रदान कर देते हैं। वह व्यक्ति ही उनका पात्र बन जाता है, उसकी जीवनचर्या उनकी कहानी बन जाती है।
इसीलिए हम उनको सिर्फ पढ़ते नहीं बल्कि एक अनुभव से गुजरते हैं। उनके पात्रों के साथ हम भी रोते हैं, हँसते हैं, क्रोधित होते हैं, निराश होते हैं। वस्तुतः हम उनकी कहानी सिर्फ पढ़ नहीं रहे होते हैं बल्कि कई बार खुद जी भी रहे होते हैं।
अपने तमाम परिचित से पात्रों के माध्यम से मानव मन के सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव को उकेर, उघाड़ और उद्घाटित कर देने का अनुपम सामर्थ्य रखने वाले कालजयी कथाकार को उनकी जन्मजयंती पर विनय सिंह बैस का सादर नमन।