प्रयागराज। ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज के तत्त्वावधान मे प्रेमचन्द की जयन्ती के अवसर पर पूर्व-संध्या मे (‘पूर्व-संध्या पर’ अशुद्ध है।) ‘प्रेमचन्दकथा-लेखन की प्रासंगिकता’ विषय पर प्रयागराज और बलिया से एकसाथ एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन हुआ, जिसमे देश के प्रतिष्ठित प्रबुद्धजन की वैचारिक सहभागिता रही।
गढ़ाकोटा, सागर से शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ० घनश्याम भारती ने कहा– मुंशी प्रेमचन्द प्रगतिशील विचारधारा के आदर्शोन्मुखी कथाकार माने जाते हैँ, उनका कथा-साहित्य स्वतन्त्रता-पूर्व की यथार्थवादी घटनाओँ को चित्रित करता है। उनके उपन्यासोँ में स्त्री-पुरुषोँ के जीवन के विविध प्रसंगों का रेखांकन हुआ है। वे उपन्यास कृषक-जीवन को भी बाख़ूबी चित्रित करने मे सफल सिद्ध हुए हैँ। उनकी कहानियोँ मे हिन्दू-मुस्लिम एकता के दर्शन होते हैँ, जिसको उनकी हिन्दी-कहानी ‘पंच परमेश्वर’ प्रमाणित करती है।
आकाशवाणी, प्रयागराज की कार्यक्रम-प्रमुख एवं सहायक निदेशक (कार्यक्रम) नेहा गुप्ता ने कहा– प्रेमचन्द ने अपनी यथार्थवादी लेखनी से सामाजिक आडम्बरोँ पर प्रहार करते हुए, जीवन की समझ का बीज समाज मे रोपित किया। हम गोदान, गबन, कफन और सेवासदन को पढ़ते ही उनकी अनूठी विश्लेषण-क्षमता से वाक़िफ़ होते हैँ। उनकी कथाओँ मे घटनाओँ का आदर्शवादी भाषिक वर्णन पाठक को सीधे कथाकार के ज़ेह्न से जोड़ते हुए, हृदय-परिवर्तन की ओर प्रेरित करता है।
आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया– आज जितने प्रकार की सामाजिक व्यवस्था के अत्याचार हैँ, प्रेमचन्द उन सबका जीवन्त चित्रण करते हुए संलक्षित होते हैँ। प्रेमचन्द ने सिद्ध कर दिखाया है कि साहित्य अपने काल का प्रतिबिम्ब होता है। जो साहित्य भाव, विचार समाज को प्रभावित करता है, वही साहित्य अमरत्व को प्राप्त करता है। यही कारण है कि प्रेमचन्द की कथा युग-युगान्तर का विषय बन चुकी है।
बलिया से श्री मुरलीमनोहर टाउन पी० जी० कॉलेज मे हिन्दी-आचार्य प्रो० जैनेन्द्रकुमार पाण्डेय ने कहा– प्रेमचन्द ने ‘साहित्य का उद्देश्य’ नामक अपने निबन्ध में लिखा है, ”जो दलित है, पीड़ित है, वंचित है– चाहे वह व्यक्ति हो या समूह– उसकी हिमायत और वकालत करना उसका ( साहित्य का) फर्ज है।” उनके साहित्य मे मुख्यतया किसानो, दलितोँ, शोषितोँ-पीड़ितोँ की आवाज़ बलन्द हुई है। वे समाज मे सभी वर्गोँ को बराबरी का हक़ दिलाना चाहते हैँ। आज भी समाज का एक बड़ा तबका शोषित, पीड़ित और उपेक्षित जीवन जीने को अभिशप्त है। प्रेमचन्द का साहित्य ऐसे लोग के पक्ष मे तनकर खड़ा है और आज भी उन्हेँ संघर्ष करने की प्रेरणा दे रहा है।
सांगली (महाराष्ट्र) से श्रीमती चम्पाबेन बालचन्द शाह महिला महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो० डॉ० प्रकाश चिकुर्डेकर ने बताया– प्रेमचन्द हिन्दी-साहित्य के युगद्रष्टा कथाकार हैँ, जिन्होँने किसान, श्रमिक, दलित तथा सामान्य जन के जीवन-संघर्ष को साहित्य के केन्द्र मे स्थापित किया। उनका कथा-साहित्य केवल अपने समय का दस्तावेज़ नहीँ है, बल्कि मानवीय संवेदना, सामाजिक न्याय तथा नैतिक मूल्योँ का शाश्वत संदेश भी है।
सतीशचन्द्र डिग्री कॉलेज, बलिया से हिन्दीविभागाध्यक्ष डॉ० श्रीपति कुमार यादव ने कहा– प्रेमचन्द के साहित्य मे निहित नैतिक मूल्य, सामाजिक चेतना और मानववादी दृष्टि आजके समाज के लिए समान रूप से प्रेरणादाई है। प्रेमचन्द स्त्री-जीवन के विभिन्न सरोकारोँ को उद्घाटित करके स्वतन्त्र भारत मे स्त्री की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक भागीदारी को सुनिश्चित करने की दिशा मे एक समतावादी दृष्टि विकसित करते हैँ।
श्री राघवेन्द्र सिंह हजारी शासकीय महाविद्यालय हटा, दमोह (म० प्र०) से हिन्दी-सहायक प्राध्यापक श्रीमती आशा राठौर ने बताया– प्रेमचन्द समाज की नस-नस से वाक़िफ़ थे, जिसके कारण उनका कथासंसार समाज की विभिन्न परिस्थितियोँ और समस्याओँ को जोड़ता हुआ दिखता है। उनकी कहानियोँ मे किसान, मज़्दूर, दलित तथा स्त्री-जीवन का यथार्थ चित्रण विद्यमान है।
आकाशवाणी, प्रयागराज से कम्पीयर वन्दना राठौर ने कहा– यदि आज हम अपने बीच प्रेमचन्द की उपस्थिति महसूस करते हैँ तो उनके प्रगतिशील विचारोँ वा यथार्थवादी आदर्शों के कारण नहीँ, बल्कि उनकी रचनाओँ मे निहित भारतीय मनुष्य की मानसिक बनावट के कारण, जिसे फलने-फूलने मे सैकड़ोँ वर्ष लगे ।
रायबरेली से साहित्यकार आरती जायसवाल ने कहा– प्रेमचन्द ने ‘आम आदमी के जीवन का सच’ कहतीँ कहानियाँ लिखीँ। ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ से परिपूर्ण कथा-साहित्य मे वे समस्या ही नहीँ दिखाते थे, बल्कि आशा का संचार करते हुए निराकरण भी करते थे।