प्रयागराज। ‘सर्जनपीठ’ के तत्त्वावधान मे सुप्रसिद्ध चिन्तक-विचारक एवं स्वतन्त्रतासेनानी राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन के जन्म-दिनांक के अवसर पर १ अगस्त को ‘पुरुषोत्तमदास टण्डन एवं उनका राष्ट्रवाद’ विषयक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसमे देश के बुद्धिजीवीवर्ग की सहभागिता रही।

मुम्बई (महाराष्ट्र) से विज्ञानी एवं पूर्व-कुलपति प्रो० के० पी० मिश्र ने कहा– टण्डन जी भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस से वर्ष १८९९ से ही जुड़ चुके थे। वे विद्यार्थी-जीवन से ही क्रान्तिकारी गतिविधियोँ मे हाथ बँटाने लगे थे, जिससे क्रुद्ध होकर अँगरेज़ी प्रशासन ने म्योर सेण्ट्रल कॉलेज, इलाहाबाद से निष्कासित करा दिया था। उन्हेँ वर्ष १९१९ मे देश को स्तब्ध कर देनेवाली घटना 'जलियाँवाला बाग़-हत्याकाण्ड का अध्ययन करनेवाली भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी-समिति का एक सदस्य बनाया गया था।
प्रयागराज से पूर्व-आइ० ए० एस०-अधिकारी महामहोपाध्याय डॉ० सुरेन्द्रकुमार पाण्डेय ने कहा– साहित्य, समाजसुधार, पत्रकारिता तथा राजनीति के साथ-साथ शिक्षा के प्रचार-प्रसार मे टण्डन जी का महत्त्वपूर्ण योगदान था। हिन्दी विद्यापीठ, हिन्दी साहित्य सम्मेलन तथा हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद के साथ शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने और हिन्दी की अनन्य सेवा करने की उनकी अनेक प्रेरक स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैँ।
आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया– वर्ष १९४९ मे संविधानसभा मे बहुमत से हिन्दी के पक्ष में प्रस्ताव पारित कराकर हिन्दी को 'राजभाषा' और देवनागरी लिपि को 'राजलिपि' घोषित कराने का श्रेय टण्डन जी को जाता है, तदनन्तर वे उसे राष्ट्रभाषा बनाये जाने की दिशा मे भी लगे रहे; परन्तु तत्कालीन सरकार की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के कारण उन्हेँ सफलता नहीँ मिली। हिन्दी के प्रबल पक्षधर टण्डन जी हिन्दी मे भारत की मिट्टी की सुगन्ध महसूस करते थे।
प्रयागराज से साहित्यकार एवं कवयित्री उर्वशी उपाध्याय ने बताया– सविनय अवज्ञा आन्दोलन, लगान की न अदायगी के लिए आन्दोलन, संयुक्त प्रान्त व्यवस्थापिका के सदस्य तदुपरान्त १९३७ मे अध्यक्ष, फिर गोलमेज कांफ्रेंस मे नेहरू जी के साथ गिरिफ़्तारी तथा बिहार किसान आन्दोलन-जैसे क्रान्तिकारी दायित्वोँ एवं योजनाओँ के लिए राजर्षि अगली पंक्ति मे खड़े रहे।