सी० एम० पी० डिग्री कॉलेज, प्रयागराज के हिन्दी-विभाग की कर्मशाला का दूसरा दिन
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सी० एम० पी० डिग्री कॉलेज के हिन्दी-विभाग की ओर से ‘भाषा-विशेषज्ञ’ के रूप मे आमन्त्रित व्याकरणवेत्ता और भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की त्रिदिवसीय कर्मशाला के दूसरे दिन यह बताया गया कि कोई व्यंजन पूर्णता की प्राप्ति कैसे करता है। व्यंजन तो लँगड़ा होता है, जब उसे स्वर की बैसाखी मिलती है तब वह चलने मे समर्थ दिखता है। आचार्य ने बताया और समझाया कि कौन-सा वाक्य अशुद्ध है और कौन-सा शुद्ध, इन्हेँ समझने के लिए व्याकरण का कौन-सा नियम उपयोगी होता है। ‘उनके लिये हमने दो फल लिए।’ उन्होँने इस वाक्य का लेखन करते हुए, बताया कि किसी वाक्य मे सबसे पहले कर्त्ता, फिर कर्म, उसके बाद यदि पूरक शब्द हो तो उसे लिख लिया जाता है और अन्त मे क्रिया का प्रयोग किया जाता है। इतना ही नहीँ, उन्होँने इसी वाक्य को शुद्ध करते हुए, अविकारी शब्द अव्यय (लिए) और विकारी शब्द (लिये) क्रिया का उपयुक्त प्रयोग बताया। इसके लिए उन्होँने अव्यय-शब्द ‘लिए’ और क्रिया-शब्द ‘लिये’ को सोदाहरण समझाया।
आचार्य ने प्रश्न किया था– कुल वर्णमालाओँ की संख्या कितनी है? इस प्रश्न को विद्यार्थी समझ न सके, फलत: अनुपयुक्त उत्तर दिये थे, फिर उन्होँने बताया तब समझ पाये। इसी अवसर पर छात्र-छात्राओँ से कवर्ग का लेखन कराया गया था। उन्होँने जब विद्यार्थियोँ से नियमपूर्वक स्पर्शी व्यंजन सुनाने के लिए कहा तब कोई विद्यार्थी शुद्धतापूर्वक सुना न सका, फिर आचार्य ने सुनाया और उसमे पंचम वर्ण की कितनी उपयोगिता और महत्ता है, इसका ज्ञान कराया।
अपनी कर्मशाला के दूसरे दिन आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया कि किसी भाव वा रस का अलग से बहुवचन नहीँ बनाया जा सकता। उन्होँने सुख-दु:ख, प्रसन्नता, हर्ष, बधाई, शुभकामना, आशीर्वाद इत्यादिक शब्दोँ का उदाहरण दिया। आचार्य ने एक परम्परा से चले आ रहे शब्दप्रयोग को अशुद्ध सिद्ध करते हुए बताया कि मिष्टान्न, पश्चात्ताप, प्रायश्चित्त, सर्जन, गमनागमन, शत-शत, बधाई, शुभकामना आदिक शब्द ही शुद्ध हैँ। उन्होँने ‘बड़ा’ और ‘बहुत’ विशेषण-शब्दोँ का व्यवहार कहाँ-कहाँ और क्योँ होता है, इसके आधार पर आकारात्मक और मात्रात्मक बोध कराया। इन्हेँ बताया। उन्होँने, ‘ही’ और ‘केवल’, ‘मात्रा’ इत्यादिक के समुचित प्रयोग को समझाया। आरम्भ, प्रारम्भ, समारम्भ, आवास, प्रवास, निवास, आप्रवास, अनिवास आदिक शब्दोँ के सोदाहरण ज्ञान कराये। उन्होँने आवेदनपत्र का लेखन करते समय ‘कृपया’ और ‘कृपा’ के प्रयोग पर प्रकाश डाला था।
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने विद्यार्थियोँ को बताया कि प्रतियोगिता और प्रतिस्पर्द्धा मे क्या अन्तर है। उन्होँने परीक्षा-परिक्षा, बाह्य-वाह्य, व्यंग्य-व्यंग– इन शब्दोँ की वर्तनी को शुद्ध बताते हुए, इनका अर्थ-विस्तार किया। उन्होँने परीक्षा और निरीक्षा, परीक्षक-निरीक्षक को भी समझाया। उनका कहना था कि उत्तरपुस्तिका चेक नहीँ की जाती, बल्कि उसका परीक्षण किया जाता है। परीक्षा अन्त: है और निरीक्षा बाह्य।
आचार्य ने अपने एक वाक्य-प्रयोग मे यह बताया कि फूल नहीँ खिलते, कलियाँ खिलती हैँ, जो फूल का रूप ग्रहण करती हैँ। उसी तरह से ‘रुई’ की खेती नहीँ होती, ‘कपास’ की होती है।
इसप्रकार आचार्य ने एक-के-बाद कई शुद्ध शब्दोँ के विषय मे बताया। उन्होँने कई प्रकार के वाक्य और शब्दोँ के विषय मे बताये, समझाये तथा लिखाये थे। कई विद्यार्थी थे, जिनमे सीखने के प्रति रुचि और लगन दिख रही थी।
अन्त मे, दूसरे दिन की कर्मशाला सम्पन्न हुई।