प्रेम की प्रकृति

मानव शरीर पंचतत्त्व से निर्मित है। ये पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के रूप मे जाने जाते हैं। भारतीय दार्शनिक परम्परा में ये पाँचों तत्त्व केवल शरीर के घटक नहीं हैं, अपितु समूची सृष्टि के आधार स्तम्भ हैं। पृथ्वी स्थिरता देती है, जल जीवन का प्रवाह है, अग्नि ऊर्जा और रूपान्तरण का माध्यम है, वायु गति और श्वास है तथा आकाश वह विस्तार है जिसमें सब कुछ घटित होता है। ये तत्त्व भौतिक हैं, दृश्य हैं, और अपने-अपने स्वरूप में स्वतंत्र भी हैं।

यदि इन पाँचों तत्त्वों को पृथक-पृथक देखा जाए, तो वे जीवन-शून्य प्रतीत होते हैं। पृथ्वी अकेली पड़ी हो तो केवल धूल है, जल अकेला हो तो बहाव मात्र है, अग्नि अकेली हो तो दाह है, वायु अकेली हो तो उच्छृंखल वेग है और आकाश अकेला हो तो रिक्त विस्तार। परन्तु जब ये एक-दूसरे से जुड़ते हैं, तब जीवन का जन्म होता है। यहीं से प्रश्न उठता है— इन तत्त्वों को एक होने के लिए किस शक्ति ने बाध्य किया?

ये तत्त्व न केवल भिन्न हैं, बल्कि कई बार परस्पर विरोधी भी हैं। अग्नि और जल का स्वभाव विपरीत है, वायु की गति पृथ्वी की स्थिरता को चुनौती देती है, आकाश का शून्य जल की सीमाओं को तोड़ता है। इन सबके बीच कोई स्पष्ट समझौता, कोई अनुबंध या कोई बौद्धिक योजना नहीं दिखाई देती। फिर भी ये तत्त्व एक साथ रहते हैं, एक-दूसरे को सहन ही नहीं करते, बल्कि एक-दूसरे के बिना अपूर्ण भी हो जाते हैं।

यह प्रश्न केवल भौतिक विज्ञान का नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न है। जब यह प्रश्न गहराता है, तब समूची प्रकृति जैसे स्वयं उत्तर देने लगती है— “क्या तुम उस छठे तत्त्व से अनभिज्ञ हो, जो जीवन में माधुर्य लाता है?” यह छठा तत्त्व है—प्रेम।

प्रेम न तो पृथ्वी की तरह ठोस है, न जल की तरह तरल, न अग्नि की तरह दहकता हुआ दृश्य, न वायु की तरह स्पर्श्य और न आकाश की तरह रिक्त। फिर भी यह इन सबमें व्याप्त है। यह वह अदृश्य शक्ति है, जो दृश्य तत्त्वों को अर्थ देती है। जब तक यह छठा तत्त्व—प्रेम—अपने आकार में प्रकट नहीं होता, तब तक सृष्टि न जैविक रूप से पूर्ण होती है और न ही लौकिक रूप से। शरीर के भीतर अंग तो होते हैं, पर जीवन नहीं; प्रकृति में तत्त्व तो होते हैं, पर सौंदर्य नहीं। प्रेम वह सेतु है, जो पदार्थ को जीवन में और जीवन को अर्थ में रूपान्तरित करता है।

प्रेम का आलम्बन लेकर ही पंचतत्त्व एक-दूसरे के समीप आते हैं। जहाँ प्रेम जन्म ले लेता है, वहाँ भिन्नता बाधा नहीं बनती। जिनके मध्य प्रेम आ जाता है, वे मिलते भी हैं और साथ चलते भी हैं। उनका मिलन कोई संयोग नहीं, बल्कि उनकी नियति बन जाता है। प्रेम दो को जोड़ता नहीं, वह दो को एक होने का साहस देता है।

प्रेम कोई घटना नहीं है कि घटे और समाप्त हो जाए। प्रेम कोई पदार्थ नहीं है कि तौला या मापा जा सके। प्रेम एक प्रचण्ड भाव है, जो देवत्त्व धारण किए हुए है। यह भाव इतना विराट है कि वह स्वयं परमात्मा को भी सोचने पर विवश कर देता है। भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में ईश्वर को भी प्रेम के अधीन बताया गया है। भक्त का प्रेम भगवान को बाँध लेता है—यशोदा का कृष्ण के प्रति प्रेम, मीरा का गिरधर के प्रति समर्पण, राधा का श्याम के प्रति अनुराग—ये सभी उदाहरण बताते हैं कि प्रेम सत्ता को नहीं मानता, वह केवल समर्पण को पहचानता है। जहाँ ज्ञान प्रश्न करता है, वहाँ प्रेम स्वीकार करता है। जहाँ तर्क सीमाएँ खींचता है, वहाँ प्रेम सीमाएँ लाँघ जाता है।

जब प्रेम मनुष्यों के मध्य जन्म लेता है, तब वह उन्हें प्रेम-बंधन में बाँधता है। यह बंधन कारागार नहीं होता, बल्कि आश्रय होता है। प्रेम दो व्यक्तियों को केवल पास नहीं लाता, वह उन्हें एक-दूसरे के भीतर प्रवेश करने देता है। इस प्रेम में ‘मैं’ और ‘तुम’ का भेद धीरे-धीरे गलने लगता है। दूसरे का सुख अपना सुख बन जाता है और दूसरे का दुःख अपनी पीड़ा।

यह बंधन बाहरी नहीं होता; इसमें कोई ज़ंजीर नहीं, कोई अनुशासन नहीं। फिर भी यह संसार का सबसे सशक्त बंधन है, क्योंकि इसमें स्वेच्छा होती है। प्रेम में बंधा हुआ व्यक्ति स्वतंत्र भी होता है और समर्पित भी। यही प्रेम का विरोधाभास है—वह बाँधकर भी मुक्त करता है।

जब यही प्रेम मानव और प्रकृति के मध्य पनपता है, तब एक अद्भुत परिवर्तन घटित होता है। यहाँ प्रेम बंधन नहीं बनाता, अपितु मुक्ति का मार्ग खोलता है। प्रकृति मनुष्य से कुछ माँगती नहीं; वह केवल देती है। जब मनुष्य प्रेमपूर्वक प्रकृति से जुड़ता है, तब वह उपभोक्ता नहीं रहता, वह सहभागी बन जाता है।

वृक्ष केवल लकड़ी नहीं रहते, नदियाँ केवल जलधारा नहीं रहतीं, पर्वत केवल पत्थर नहीं रहते— वे सभी जीवंत सत्ता बन जाते हैं। इस प्रेम में मनुष्य अहंकार से मुक्त होता है। वह स्वयं को सृष्टि का स्वामी नहीं, बल्कि सृष्टि का अंश मानने लगता है। यहीं प्रेम मुक्ति बन जाता है।

यही प्रेम की सबसे गूढ़ और रहस्यमय प्रकृति है— प्रेम ही बंधन है और प्रेम ही मुक्ति है। जब प्रेम स्वार्थ से जुड़ता है, तब वह बंधन बन जाता है और जब प्रेम समर्पण से जुड़ता है; वह मुक्ति बन जाता है। बंधनों से भयभीत मनुष्य अक्सर प्रेम से भी डरने लगता है, क्योंकि उसने प्रेम को अधिकार, अपेक्षा और स्वामित्व में बदल दिया है। परन्तु शुद्ध प्रेम कभी जकड़ता नहीं, वह केवल आलिंगन करता है।

प्रेम ही सत्य है, क्योंकि उसमें कोई छल नहीं होता। प्रेम ही शाश्वत है, क्योंकि वह जन्म और मृत्यु से परे है। प्रेम ही जीवन है, क्योंकि वही जीवन को जीने योग्य बनाता है और प्रेम ही निर्वाण है, क्योंकि वही अहंकार का पूर्ण विसर्जन करता है। जहाँ प्रेम नहीं, वहाँ अस्तित्व तो हो सकता है, जीवन नहीं। जहाँ प्रेम है, वहाँ पीड़ा भी अर्थ पा जाती है। प्रेम जैसा दूसरा कुछ नहीं है। न उससे बड़ा कोई धर्म है, न उससे गहरा कोई दर्शन और न उससे ऊँचा कोई सत्य ही है।

यदि पंचतत्त्व शरीर का आधार हैं, तो प्रेम आत्मा का आधार है। बिना प्रेम के सृष्टि केवल संरचना है और प्रेम के साथ सृष्टि एक जीवंत काव्य बन जाती है। अतः प्रेम को केवल भावना न समझें— उसे जीवन की मूल सत्ता के रूप में देखें। क्योंकि जब प्रेम है, तभी जीवन है और जहाँ जीवन है, वहीं परमात्मा है।