राघव के दोहे

प्रकृति हँसे सबसे कहे, छठा तत्त्व पहचान।
नाम प्रेम है उसका, जो दे सबको प्राण॥
ठोस तरल ये कुछ नहीं, न दृष्टि न स्पर्श।
फिर भी सबमें व्याप्त है, बन जीवन का हर्ष॥
प्रेम बिना सब व्यर्थ हैं, ये जीवन आधार।
प्रेम मिलि तो देह ने, पाया है विस्तार।
प्रेम न जोड़े दो हृदय, ये करता सब एक।
‘मैं’ ‘तू’ ये काटे सदा, मिटे भेद के लेख॥
प्रेम भार न मात्रा, न घटे न होए नाश।
इसमे रमते देवता, भाव प्रचंड प्रकाश॥
राघव दो के बीच जब, प्रेम जगाये प्रीति।
बंधन कारा न बने, पनपे अनुपम रीति॥
न अनुशासन मानता, फिर भी बड़ा विधान।
स्वेच्छा में ही मुक्ति हो, यही प्रेम की शान॥
प्रेम न जकड़े किसी को, आलिंगन पहचान।
पीड़ा को भी अर्थ दे, ये जीवन का गान॥
प्रेम सत्य, शाश्वत सदा, जन्म-मरण के पार।
प्रेम ही राघव रुचि है, करे अहं संहार॥