‘रिटायर्ड शिक्षकों’ को ‘रिटायर’ क्यों नहीं किया जाता?

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

इन कथित ‘रिटायर्ड शिक्षकों’ की शोध कराने की उम्र ९० साल कर दी जाये, ताकि मूढ/मूढ़ सरकार की गर्हित शोधनीति की क़ब्र ख़ुद दी जाये।

हमारे जो विद्यार्थी युवा हैं और वय-वार्द्धक्य के साथ अनुभव-सम्पन्न हो रहे हैं, उनकी उपेक्षा करते हुए, ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ ख़ुद की क़ब्र खुदवाने की स्थिति बना रही है। सेवानिवृत्त शिक्षकों को घर बैठकर पोते-पोतियाँ और नाती-नातिनियों को गोद मे लेकर घुमाते हुए, पारिवारिक सुख को भोगना चाहिए, न कि युवा अध्यापकों के हक़ पर अपनी ‘काली नज़रें’ स्थिर करनी चाहिए।

आज शोधस्तर का जितना पतन हो चुका है, उसके लिए उपर्युक्त शिक्षक ही उत्तरदायी हैं और उन्हीं के पतित मार्ग पर हमारी युवा अध्यापक-अध्यापिकाएँ भी अग्रसर हैं। इसके लिए देश का ‘विश्वविद्यालय-प्रशासन’ भी कम उत्तरदायी नहीं है। इसका मुख्य कारण ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक’, ‘विश्वहिन्दू परिषद्’, ‘भारतीय जनता पार्टी’ आदिक के संरक्षण मे पल-बढ़ रहे/रहीं विश्वविद्यालय के/की कुलपति हैं।

सरकार के इस बेईमान नज़रिये का विरोध करना होगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २६ मार्च, २०२२ ईसवी।)