आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
मेरी आँखों के सामने एके-४७ है
उसे देख-देखकर
केवल ख़याली पुलाव पका-पकाकर रह जाता हूँ।
सामने मेरा घर और परिवार वर्ज्य दीवार की भाँति
सीना तानकर खड़ा दिखता है।
बेशक, बँधी मुट्ठियाँ हैं।
दायित्व का बन्धन
मुट्ठियों से उलझने लगता है।
उसे खोलकर कापुरुष बनाने का यत्न करता है।
दोस्तो!
मत भूलो, दायित्व का बन्धन
पत्थर को भी पिघला देता है।
अपना सोचा और कहा हुआ
पानी-पानी हो जाता है।
राक्षसीवृत्ति और अहंकारी मनोवृत्ति को
भस्मीभूत करना अपरिहार्य दिखने लगा है।
जब अपने ही लोग माथे पर हाथ फिराने लगते हैं
क्रान्ति का भूत हिरन हो जाता है।
कल्पना और विचार की परिधि
संकुचित होने लगती है;
भाव और संवेदना शुष्क पड़ने लगती हैं।
मगर मत भूलो!
ज़िद की सुषुप्त ज्वालामुखी यदि जाग्रत् हो गयी
तो ऐसी फूटेगी कि भागने के लिए
गली भी नहीं मिलेगी।
हर गली से ‘पालतू कुत्ते’ ही
‘जंगली’ चरित्र जीते हुए खा जायेंगे
और हम
ठठाकर कर हँसते रहने का मक़्सद पा जायेंगे।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २८ मार्च, २०२२ ईसवी।)