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“किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्रभर फिर भी, ये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोखा है सब मगर फिर भी”– फ़िराक़

◆ आज (२८ अगस्त) फ़िराक़ गोरखपुरी की १२५ वीं जन्मतिथि है।

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

फ़िराक़ एक फक्कड़, किन्तु ख़ुद्दार शख़्सीयत (‘शख़्सियत’ अशुद्ध शब्द है।) का नाम है। पाँव से सिर तक की उनकी सभ्यता देखने के बाद कोई भी व्यक्ति एक बार ठिठक कर रह जाता था। उनकी टोपी से बाहर निकलने को आतुर बिखरे बाल, शेरवानी के बन्द बेतरतीब बटन, पाजामे का लटकता इज़ारबन्द, हाथ में सिगरेट, गहरी-गहरी कसैली आँखें एक अद्भुत व्यक्तित्व के स्वामी थे, फ़िराक़ गोरखपुरी। उन्हें स्वयं के कारनामों पर बेहद नाज़ था। वे स्वयं के प्रति आसक्त थे, तभी तो वे कहने से भी नहीं चूकते थे :—
“आनेवाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअस्रों,
जब ये ख़याल आयेगा उनको, तुमने फ़िराक़ को देखा था।”

फ़िराक़ ने ग़ज़ल और रुबाइयों को एक नयी शैली और स्वर दिया है, जिसमें अतीत की परिस्थितियों की अनुगूँज है तो वर्तमान का वैकल्य। फ़ारसी, हिन्दी, अँगरेज़ी-भाषा, ब्रजबोली तथा भारतीय संस्कृति के वे गहन अध्येता थे। यही कारण है कि उनकी शाइरी (‘शायरी’ अशुद्ध है) में बिखरी हिन्दुस्तान की सोंधी माटी की महक जन-जन को आत्मीय बना लेती है। उनकी उर्दू-शाइरी का एक बड़ा हिस्सा रुमानियत, रहस्य तथा शास्त्रीयता में निबद्ध है, जहाँ पर जन-जीवन और प्रकृति-चित्रण का प्राय: अभाव लक्षित होता है। यद्यपि वे परम्परागत भाव-बोध के पक्षधर थे तथापि उन्होंने अपने शब्दभाण्डार के कपाटों को अनावृत करके, उसे नयी भाषा और नये विषयों से और समृद्ध किया है। निस्सन्देह, सामाजिक वेदना व्यक्तिगत अनुभूति के रूप में उनकी शाइरी में रची-बसी लक्षित होती है। दैनिक जीवन के कटु सत्य और आसन्न कल के प्रति आशा को भारतीय संस्कृति और लोकभाषा के प्रतीकों से समन्वित करते हुए, उन्होंने अपनी शाइरी और रुबाइयों को लोक-जीवन में परिव्याप्त किया है।

फ़िराक़ की रचनाशीलता में ‘जाग्रत् भारत’ का दर्शन प्राप्त होता है; वही भारत उनसे पूर्व ‘सबद-साखी’ में जाज्वल्यमान था; ‘गुरुग्रन्थ साहिब’ में मुसकराता था तथा ‘दीने इलाही’ में झिलमिलाता था। इस परिप्रेक्ष्य में फ़िराक़ की यह रचना क़ाबिले ग़ौर है :—
“सरज़मीं ने हिन्द पर अकबाये आलम,
के फ़िराक़ काफ़िले बसते गये, हिन्दोस्ताँ बनता गया।’

इसमें कोई शक नहीं कि फ़िराक़ के भीतर ‘एक और’ फ़िराक़ रहता था, जो एक अच्छा इंसान था और इंसानियत को पूजता था :—
“ग़ैर का क्या जानिए क्यों मुझको बुरा कहते हैं,
आप कहते हैं जो ऐसा तो बज़ा कहते हैं।
वाकई तेरे इस अन्दाज़ को क्या कहते हैं,
न वफ़ा कहते हैं जिसको न जफ़ा कहते हैं।
हो जिन्हें शक, वो करें और ख़ुदाओं की तलाश,
हम तो इंसान को दुनिया का ख़ुदा कहते हैं।”

जीवन की सन्ध्या में फ़िराक़ की दैहिक अस्वस्थता बनी रही; हमसफ़र थी तो शराब, जिसने चैन से उन्हें न तो जीने दिया और न ही मरने दिया। वे नितान्त एकाकी हो चुके थे। अपने जीवन के एकान्त-क्षणों में उनकी सर्जनशीलता कुछ इस रूप में सामने आयी थी :—
“अब अक्सर चुपचाप से रहे हैं यूँ ही कभी लब खोले हैं,
पहले फ़िराक़ को देखा होता, अब तो बहुत कम बोले हैं।”

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २८ अगस्त, २०२१ ईसवी।)
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