डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
आज घर-परिवार अशान्त लक्षित हो रहे हैं। किसी में भी धैर्य धारण करने की सामर्थ्य लक्षित नहीं हो रही है। सारे ऐश्वर्य-वैभव के भोक्ता हम ही रहें, स्वार्थपरक ऐसा विचार जैसे ही मनुष्य के मन-मस्तिष्क में कौंधता है वैसे ही हृदय की निर्मलता पर पद-प्रहार करते हुए, कालुष्य का आधिपत्य हो जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण ‘सात्त्विकता’ के स्थान पर ‘तामसिकता’ का अधिकार हो जाता है। ऐसे में, मनुष्य का भाव-बोध विकृत होने लगता है और संस्कृति उससे सुदूर होने लगती है। वह एक ऐसा क्षण होता है, जब मनुष्य स्वस्थ और सकारात्मक निर्णय कर सकने में समर्थ नहीं बन पाता; कारण कि उसके मन-मस्तिष्क में अन्तर्द्वन्द्व ‘हाँ’ और ‘नहीं’ को लेकर चलता रहता है। कालान्तर में, वही अन्तर्द्वन्द्व ‘संघर्षण’ में परिणति होता दृष्टिगोचर होता है, जहाँ ‘संस्कार’ और ‘विकार’ घमासान की स्थिति में दिखते हैं; अन्तत:, संस्कार पराजित होता है और मन: विकार सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ ‘महिमामण्डित’ होता है। आश्चर्य तब होता है जब भाव और विचारबोध के साथ मनुष्य दोनों प्रवृत्तियों पर दृष्टिनिक्षेपण करता है, परन्तु ‘सत्य’ को स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा पाता। असद् का इतना प्राबल्य रहता है कि वह उसका वशीभूत बनकर रह जाता है, जो निम्न श्रेणी का एक ‘दासत्व’ है।
अब हम मूल विषयबिन्दु से सम्पृक्त होते हैं। वैसी स्थिति क्यों बन गयी अथवा कहाँ से आ गयी? इसका संज्ञान करना अभीष्ट है।
मनुष्य इस तथ्य को सिद्धान्त और व्यवहार-स्तर पर मानता आया है— मनुष्य के जीवन की प्रथम पाठशाला परिवार है। ऐसे में, यह स्वयंसिद्ध है कि जैसा पारिवारिक परिवेश रहेगा वैसा ही उस परिवार से सम्बन्धित सदस्य का आचरण भी रहेगा। ऐसी स्थिति में, उस परिवार का सामूहिक दायित्व बनता है कि उसका प्रत्येक सदस्य करुणा, सहानुभूति, सहिष्णुता, श्रद्धा, परोपकारिता, सहकारिता, साहसिकता, दानशीलता, त्यागमयता, नि:स्वार्थपरता, एकोSहमं सर्वेषाम्, वसुधैवकुटुम्बकम्, समन्वयवादिता आदिक उदात्त गुणों से समृद्ध-सम्पन्न बना रहे। ऐसे गुणागार ‘चरित्रसम्पन्न’ होते हैं। व्यक्तित्वसम्पन्न ऐसे मनुष्य घर-परिवार से निकलकर जब विस्तृत सामाजिक परिवेश से सम्बद्ध होते हैं तब उनका आभामण्डल देखते ही बनता है। आगे चलकर, ऐसे ही प्रतिभावान् मनुष्य जब समाज का नेतृत्व करते हैं तब समाज का एक-एक सदस्य आँखें मूँदकर अपने नेता के प्रति विश्वस्त रहता है, क्योंकि वह अपने नेता की त्यागशीलता और लोकवादिता के धर्म को परख चुका रहता है। वह इस सत्य को अंगीकृत किये रहता है कि उसे जिसका नेतृत्व प्राप्त है, वह किसी भी प्रकार की स्पृहा से स्वयं को पृथक् कर, लोकमानस की अभिलाषा को संचित कर, उसे पूर्त्त करने के लिए तत्पर है।
देश में जब संस्कार के मूल से जुड़े ऐसे सुपात्र उभर कर आयेंगे तब नेतृत्व में कहीं-कोई विकार नहीं दिखेगा और सम्पूर्ण देश संघटित रूप में अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर निखरता हुआ संलक्षित होगा।
आज देश में इसी संस्कार का पूर्णत: अभाव है। यही कारण है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ‘अनुशासन’ का क्षरण होता जा रहा है; क्योंकि ‘अनुशासन’ ही एक ऐसा शब्द है, जिसके राहित्य होने पर सारी विसंगतियाँ एक साथ देश पर आक्रमण कर विद्रूपता के अधीन कर लेती हैं और देशवासी सहजता के साथ ‘आत्मसमर्पण’ कर जाते हैं। देशवासी जानते रहते हैं कि अनुशासन की अर्गला पाँवों में पड़ गयी तो वे स्वार्थ की पूर्ति नहीं कर पायेंगे; निर्द्वन्द्व होकर पापाचार में लिप्त रहते हुए, ऐश्वर्य का उपभोग नहीं कर पायेंगे। जैसे ही इस प्रकार के विचार मुखरित होते हैं, मनुष्य अपने चारों ओर भौतिकता का एक आभामण्डल बना लेता है; साथ ही एक विद्वेषपूर्ण चक्रव्यूह की रचना भी करता है, जिसे वह अबेध्य बनाये रखना चाहता है, परन्तु प्रत्यक्षत:-परोक्षत: उसी वृत्ति के कई अन्य प्रतिद्वन्द्वी भी उभरते हैं। इस प्रकार सौमनस्य का अवरोहण होने लगता है और वैमनस्य का आरोहण, जो कतिपय कालखण्डों के पश्चात् कलह-द्वारा समाज की आराधना करने के कार्य में प्रयुक्त किया जाता है, सम्पूर्ण मानव-सभ्यता के विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।
आइए! हम सभी इन विसंगतियों से स्वयं को परे धकेलते हुए, हर शंका का समाधान करने में समर्थ बनें।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १३ अगस्त, २०१८ ई०)