पुत्रि! पवित्र किए कुल दोऊ


चित्रकूट का वन उस दिन असाधारण रूप से शांत था।

वायु जैसे अपने वेग को रोककर किसी महान संवाद की प्रतीक्षा कर रही थी। मंदाकिनी का जल सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक निर्मल प्रतीत होता था। वृक्षों पर बैठे पक्षियों ने भी अपना कलरव जैसे धीमा कर दिया था।

भरत का हृदय-विदारक मिलन, अयोध्या की व्यथा और महाराज दशरथ के देहावसान के पश्चात् अब एक और महत्त्वपूर्ण मिलन होने जा रहा था।

मिथिला से महाराज जनक आ रहे थे।

किन्तु यह केवल पिता का अपनी पुत्री से मिलना नहीं था।

यह उस पुरुष का आगमन था जिसे संसार विदेह कहता था।

और जिसके सम्मुख बैठी थी—

भूमि की पुत्री,
धर्म की मूर्ति,
त्याग की पराकाष्ठा,
मर्यादा की अधिष्ठात्री—

सीता।


जनक का रथ आश्रम के समीप रुका।

उन्होंने किसी राजा की भाँति नहीं, एक तपस्वी की तरह भूमि पर उतरकर पहले वनभूमि को प्रणाम किया।

उनकी दृष्टि राम पर पड़ी।

वे नतमस्तक हो गए।

राम ने उन्हें उठाया।

फिर जनक की दृष्टि धीरे-धीरे सीता पर पहुँची।

वह वही पुत्री थी…

किन्तु फिर भी वही नहीं थी।

राजमहलों में पली वह कोमल कन्या अब वल्कलधारिणी थी।

किन्तु उसके मुख पर ऐसा तेज था, जो मिथिला के राजमहलों में भी कभी नहीं देखा गया था।

जनक कुछ क्षण मौन रहे।

फिर उन्होंने आगे बढ़कर अपनी पुत्री के सिर पर हाथ रखा।

सीता चरणों में झुक गई।

जनक ने उसे उठाया नहीं।

वे स्वयं भूमि पर बैठ गए।

और बोले—

“पुत्रि… आज मैं राजा नहीं हूँ।
आज मैं केवल तुम्हारा पिता हूँ।”

यह सुनते ही वर्षों से संयमित भावनाओं का बाँध सीता की आँखों में भर आया।

किन्तु अगले ही क्षण उसने उन्हें रोक लिया।

जनक मुस्कराए।


उन्होंने अत्यन्त शांत स्वर में पूछा—

“पुत्रि!

बचपन से मैंने तुम्हें एक ही शिक्षा दी थी।

संसार परिवर्तनशील है।

शरीर नश्वर है।

संबंध भी आत्मा के उपकरण हैं।

तुम विदेह की पुत्री हो।

मैंने तुम्हें देह से ऊपर उठना सिखाया था।

फिर आज तुम्हारी आँखों में यह नमी क्यों है?

क्या तुम्हारा वैराग्य डोल गया?”

वन बिल्कुल शांत हो गया।

राम भी मौन थे।

लक्ष्मण की दृष्टि भूमि पर थी।

ऋषिगण प्रतीक्षा करने लगे—

आज सीता क्या उत्तर देगी?


सीता ने धीरे-धीरे अपना मुख उठाया।

उसकी आँखों में अश्रु थे।

किन्तु वे दुर्बलता के नहीं थे।

वह बोली—

**”पिताश्री!

आपने मुझे विदेह होना सिखाया था।

किन्तु आपने कभी यह नहीं सिखाया कि विदेह होने का अर्थ हृदयहीन होना है।”**

जनक ने ध्यान से उसकी ओर देखा।

सीता आगे बोली—

“यदि वैराग्य मनुष्य को करुणा से शून्य कर दे,

तो वह ज्ञान नहीं,

केवल कठोरता है।

यदि समत्व मनुष्य को संवेदनहीन बना दे,

तो वह योग नहीं,

जड़ता है।

यदि धर्म आँसू बहाने से रोक दे,

तो वह धर्म नहीं,

अहंकार है।”

वन के ऋषियों की आँखें चमक उठीं।

सीता आगे कहती गई—

“पिताश्री!

मैं रोती हूँ,

क्योंकि मैं मनुष्य हूँ।

किन्तु मैं धर्म नहीं छोड़ती,

क्योंकि मैं आत्मा हूँ।

यही दोनों का संतुलन ही जीवन है।”


जनक ने पहली बार अनुभव किया—

आज उनकी पुत्री उनसे भी आगे निकल चुकी है।


जनक बोले—

“तो तुम्हारे अनुसार विदेह होना क्या है?”

सीता मुस्कराई।

फिर अत्यन्त धीमे स्वर में बोली—

“विदेह होना देह का त्याग नहीं है।

देह में रहते हुए देह के अहंकार का त्याग है।

संबंधों का त्याग नहीं,

संबंधों में स्वार्थ का त्याग है।

प्रेम का अंत नहीं,

प्रेम का विस्तार है।

जब अपना और पराया समाप्त हो जाए—

वही विदेह है।”

जनक मौन हो गए।


कुछ देर बाद जनक ने पूछा—

“पुत्रि!

लोग तुम्हें रामभक्त कहते हैं।

कुछ तुम्हें आदर्श पत्नी कहते हैं।

कुछ तुम्हें त्याग की मूर्ति कहते हैं।

तुम स्वयं अपने जीवन को किस रूप में देखती हो?”

सीता ने बिना विलम्ब उत्तर दिया—

“मैं स्वयं को किसी उपाधि में नहीं बाँधती।

किन्तु यदि मेरे जीवन का कोई आधार है,

तो वह तीन हैं—

धर्म, भक्ति और मर्यादा।

धर्म मुझे सत्य से जोड़ता है।

भक्ति मुझे अहंकार से बचाती है।

और मर्यादा मुझे शक्ति का सदुपयोग करना सिखाती है।

इन तीनों में से एक भी टूट जाए,

तो मनुष्य अधूरा हो जाता है।”


अब जनक की आँखें भीग उठीं।

उन्होंने दोनों हाथ उठाकर कहा—

**”पुत्रि!

आज मुझे ज्ञात हुआ—

मैंने तुम्हें जन्म नहीं दिया,

मैंने केवल पृथ्वी से प्राप्त किया था।

तुम मेरी पुत्री नहीं,

स्वयं धर्म की कन्या हो।

तुमने मिथिला को भी पवित्र किया,

और रघुकुल को भी।

इसलिए मैं आज पूरे हृदय से कहता हूँ—

‘पुत्रि! पवित्र किए कुल दोऊ।'”

इतना कहते-कहते उनका स्वर भर्रा गया।

वन के समस्त ऋषि भाव-विह्वल हो उठे।


सीता ने पिता के चरणों पर मस्तक रख दिया।

फिर बोली—

“यदि किसी कुल की पवित्रता मेरे कारण हुई है,

तो वह मेरे कारण नहीं।

वह इसलिए हुई है कि दोनों कुलों ने धर्म को मुझसे ऊपर रखा।

जहाँ धर्म सर्वोपरि होता है,

वहाँ कुल स्वयं पवित्र हो जाते हैं।”


कुछ देर बाद जनक ने पूछा—

“यदि आज मैं तुम्हें मिथिला वापस चलने को कहूँ,

तो क्या तुम चलोगी?”

वन फिर शांत हो गया।

सीता ने बिना क्षण भर सोचे उत्तर दिया— “पिताश्री!

जिस दिन आपने मेरा पाणिग्रहण श्रीराम के हाथों में सौंपा था, उसी दिन मेरी दिशा बदल गई थी।

पुत्री का जन्म पिता के यहाँ होता है, किन्तु उसका धर्म पति के साथ पूर्ण होता है। मैं मिथिला की स्मृति हूँ, किन्तु अयोध्या की मर्यादा हूँ। मैं जनक की पुत्री हूँ, पर राम की सहधर्मिणी हूँ। मैं लौट सकती हूँ, पर धर्म लौट नहीं सकता।


जनक ने उठकर अपनी पुत्री को देखा। अब उन्हें अपनी पुत्री में केवल सीता नहीं दिखाई दे रही थी। उन्हें उसमें स्वयं पृथ्वी का धैर्य, गंगा की पवित्रता, अग्नि की तपश्चर्या, आकाश की विशालता और वेदों का मौन सत्य दिखाई दे रहा था।

उन्होंने मन ही मन कहा—

“आज मैं समझ गया—
राम केवल मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं हैं।
उनकी मर्यादा की पूर्णता सीता हैं।
यदि राम धर्म हैं,
तो सीता उस धर्म की आत्मा हैं।”

वन में सूर्य अस्त होने लगा।।किन्तु उस दिन चित्रकूट में एक नया सूर्य उदित हुआ था— ज्ञान का, करुणा का और धर्म का।


डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव’