डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
प्रभात का समय था। आश्रम के पीछे बहने वाली छोटी नदी के तट पर निरंजन अकेला बैठा था। जल का प्रवाह शांत था, परन्तु उसके भीतर निरन्तर गति थी। वह उसी प्रवाह को देख रहा था—बिना किसी विचार के, केवल साक्षी बनकर।
पिछले कुछ दिनों से उसकी साधना में एक परिवर्तन आया था। पहले वह ध्यान में बैठते ही विचारों से संघर्ष करता था, अब वह उन्हें आने-जाने देता था। पहले वह कर्म से थक जाता था, अब कर्म उसके लिए साधना बनता जा रहा था।
उसे आचार्य के शब्द स्मरण आए— साक्षी भाव कर्म से भागना नहीं सिखाता, कर्म को शुद्ध करना सिखाता है।
इसी चिंतन में वह डूबा था कि आश्रम का एक सेवक आया— निरंजन जी! गौशाला में एक बछड़ा बीमार है, आचार्य ने आपको बुलाया है।
निरंजन तुरंत उठा और गौशाला की ओर चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर उसने देखा—एक छोटा बछड़ा भूमि पर पड़ा था, उसकी साँसें तीव्र थीं। कुछ क्षण के लिए निरंजन का मन व्याकुल हो उठा। उसे लगा—“क्या यह बच पाएगा?”
फिर उसे आत्मबोध हुआ और भगवान श्रीकृष्ण के गीता-ज्ञान का स्मरण हुआ— साक्षी बनो, पर संवेदनहीन नहीं; कर्म करो, पर कर्त्ता मत बनो।
उसने बछड़े के शरीर पर धीरे-धीरे हाथ फेरा, जल लाकर उसके मुँह में डाला और वैद्य को बुलाने के लिए एक बालक को भेजा। उसके भीतर करुणा थी, परन्तु भय नहीं था; प्रयास था, परन्तु परिणाम की चिंता नहीं थी।
आचार्य दूर खड़े यह सब देख रहे थे। उन्होंने पास आकर पूछा— निरंजन! अभी तुम्हारे भीतर क्या चल रहा है?
निरंजन ने शांत स्वर में कहा कि गुरुदेव! पहले मैं व्याकुल हो जाता, सोचता—यह जीवित रहेगा या नहीं। अभी मैं केवल अपना कर्तव्य कर रहा हूँ। परिणाम ईश्वर पर छोड़ दिया है।
आचार्य के चेहरे पर संतोष झलक उठा— यही कर्मयोग है। साक्षी भाव के बिना कर्म बन्धन बनता है, और कर्म के बिना साक्षी भाव पलायन बन जाता है। जब दोनों मिलते हैं, तब जीवन योग बन जाता है।
निरंजन ने पूछा— गुरुदेव! क्या यही गीता का ‘निष्काम कर्म’ है?
आचार्य ने कहा— हाँ। निष्काम का अर्थ कर्म का त्याग नहीं है अपितु फल की आसक्ति छोड़ना है।
उन्होंने श्लोक उच्चारित किया—
> ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
> मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥’
> (गीता 2.47)*
“तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं। और अकर्म में भी आसक्ति मत रखो।”
निरंजन के भीतर यह श्लोक जैसे जीवित हो उठा। उसे लगा—अब तक वह कर्म करता था फल के लिए और ध्यान करता था शांति के लिए। आज पहली बार उसे अनुभव हुआ कि कर्म और ध्यान अलग नहीं हैं।
बछड़े की स्थिति धीरे-धीरे सुधरने लगी। वैद्य ने औषधि दी और कहा— अब यह ठीक हो जाएगा।
निरंजन ने भीतर एक हल्की प्रसन्नता अनुभव की, परन्तु वह प्रसन्नता भी शांत थी—उत्साह से भरी हुई, पर आसक्ति से मुक्त।
आचार्य ने कहा— देखो! जब परिणाम अनुकूल होता है तो प्रसन्नता आती है, प्रतिकूल होता है तो दुःख। परन्तु साक्षी भाव में दोनों केवल अनुभव बन जाते हैं।
निरंजन ने पूछा— क्या तब मनुष्य भावशून्य हो जाता है?
आचार्य ने उत्तर दिया— नहीं। वह भावों का दास नहीं रहता, भावों का साक्षी बन जाता है। करुणा रहती है, प्रेम रहता है, परन्तु उनमें बन्धन नहीं रहता।
आश्रम में उस दिन अनेक कार्य थे, जैसे किसानों के साथ बीज वितरण, विद्यार्थियों को पाठ, और सायंकालीन सत्संग की व्यवस्था। निरंजन पूरे दिन कार्य में लगा रहा। आश्चर्य की बात यह थी कि उसे थकान नहीं हुई।
रात्रि में जब वह नदी के तट पर पुनः बैठा, तो उसने अनुभव किया कि आज का दिन ध्यान में बैठने से अधिक गहरा था। हर कर्म ध्यान बन गया था।
उसे लगा— जब मैं कार्य करता हूँ और भीतर साक्षी रहता हूँ, तब जीवन स्वयं ध्यान हो जाता है।
आचार्य उसके पास आकर बैठ गए।
उन्होंने कहा— निरंजन! अब तुम समझ रहे हो कि आश्रम में सेवा क्यों आवश्यक है? केवल ध्यान करने से मन शुद्ध नहीं होता, सेवा से भी होता है।
निरंजन ने पूछा— क्या सेवा भी साधना है?
आचार्य बोले वत्स! जब सेवा में अहंकार नहीं होता, तब वह पूजा बन जाती है।
फिर उन्होंने एक सूक्ति कही कि ‘सेवा ही सच्चा योग है, क्योंकि उसमें ‘मैं’ नहीं रहता।’
निरंजन की आँखें नम हो गईं।
उसे स्मरण आया—जब वह पहली बार आश्रम आया था, तब वह ज्ञान पाने आया था; अब उसे लग रहा था कि वह स्वयं को खोने आया है—और उसी में उसे स्वयं मिल रहा है।
रात्रि का आकाश तारों से भरा था। नदी का जल चन्द्रमा की रोशनी में चमक रहा था। उस दृश्य को देखते हुए निरंजन के भीतर एक गहरा संतुलन अनुभव हुआ—
मौन और कर्म, ध्यान और सेवा, साक्षी और करुणा—सब एक हो गए थे।
उसने मन ही मन कहा—
“अब जीवन केवल मेरा नहीं है; यह एक साधना है।”
आचार्य ने जैसे उसके मन को पढ़ लिया—
“यही समन्वय जीवन को पूर्ण बनाता है। जब तुम साक्षी रहते हुए कर्म करते हो, तब तुम मुक्त रहते हुए भी संसार में रहते हो।”
निरंजन ने प्रणाम किया। उसे लगा कि आज उसकी साधना का एक और चरण पूर्ण हुआ और उसी शांति के साथ एक नई यात्रा प्रारम्भ हुई जहाँ कर्म ध्यान था और ध्यान कर्म।