राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’-

प्रधान संपादक, इण्डियन वॉयस 24
धरती का सीना फाड़ अन्न हम सब उपजाते हैं |
मेहनतकश मज़दूर मगर हम भूखे ही मर जाते हैं |
धन की चमक के आगे हम कहीं ठहर न पाते हैं |
बाग खेत खलिहान हमारे हमसे छीने जाते हैं |
सारी धरती हम सबकी है हम फिर भी सताए जाते हैं |
धरती का सीना फाड़ अन्न हम सब उपजाते हैं ||
भारत की सीमा पर फौजी मेरा ही खून पसीना है |
दुश्मन की गोली के आगे मौजूद हमारा सीना है |
मगर जुर्म अन्याय सह रहे हम ठुकराए जाते हैं |
धरती का सीना फाड़ अन्न हम सब उपजाते हैं ||
मेरे खून पसीने पर हक़ चलता है सरकारों का |
मेरी मेहनत के रंग से रंग जमता है दरबारों का |
हम मजदूरों के हिस्से में फिर भी दुःख ही आते हैं |
धरती का सीना फाड़ अन्न हम सब उपजाते हैं ||