प्रयागराज। इन दिनो देश के शिक्षालय-परिसर मे एक ही बात की अनुगूँज सुनायी पड़ रही है, जोकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू० जी० सी०– युनिवर्सिटी ग्राण्ट कमीशन) की ओर से विगत १५ जनवरी को लागू की गयी उसकी कठोर और पक्षपातपूर्ण नियमावली है, जिसके कारण सवर्ण-समाज को अवर्ण-समाज और अन्य पिछड़े-वर्ग के विरुद्ध ताल ठोँकने के लिए बाध्य और विवश कर दिया गया है। वहीँ अवर्ण-समाज और अन्यपिछड़े-वर्ग की लामबन्दी भी देखी जा रही है, जोकि देश मे गृहयुद्ध को आमन्त्रण दे चुका है। न्यायालय के न्यायमूर्तियोँ ने विवेक का प्रयोग कर, उसपर अपनी रोक लगा दी है। इसकी चिन्ता समसामयिक और ज्वलन्त विषयोँ पर चर्चा-परिचर्चा करानेवाली संस्था ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज को हुई और देश के कुछ प्रबुद्धजन ने मिलकर २ फ़रवरी को इस विषय पर गम्भीरतापूर्वक मन्थन किया।

प्रो० उमापति दीक्षित (केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, शिक्षा-मन्त्रालय, भारत-सरकार, आगरा) ने कहा– १५ जनवरी २०२६ से प्रवर्तित यू० जी० सी० का नया क़ानून शैक्षिक स्वायत्तता, संस्थागत परामर्श एवं शिक्षक-छात्रहित के संतुलन पर प्रश्नचिह्न अंकित करता है। त्वरित केन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति से विश्वविद्यालयीय लोकतन्त्र का क्षरण होता प्रतीत होता है। व्यापक विमर्श, संशोधन एवं पारदर्शी क्रियान्वयन् के बिना यह विधि असंतोष को और गहन करेगी, अतः नीति-निर्माताओँ को संवैधानिक मर्यादा पर तत्काल पुनर्विचार करना चाहिए ।
डॉ० विनय कुमार सिंह (अध्यापक :– उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, तुरकौलिया, पूर्वी चम्पारण) ने बताया– कैम्पस मे भेदभाव रोकने के लिए ऐसी नियमावली बनाना, जिससे समाज मे ही भेदभाव बढ़ने लगे पुनर्विचार की अपेक्षा करता है।जब कोई सरकार मत और बहुमत प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दृष्टि से ही निर्णय करे तो लोकतन्त्र की शक़्ल 'भीड़तन्त्र' मे ही दिखेगी, जिस स्थिति मे सम्यक् सामाजिक विकास नहीँ हो सकता। आशा की जाती है कि न्यायालय मे बहुविध आलोड़न-विलोड़न के पश्चात् कथित नियमावली का वास्तविक चेहरा दिखे।
देवेन्द्रकुमार सिंह (पूर्व-प्रवक्ता :– विज्ञान-संकाय, जमुना क्रिश्चियन कॉलेज, प्रयागराज) का मत है– यू० जी० सी०– २०२६ देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे गृहयुद्ध प्रारम्भ होने की प्रबल सम्भावना दिख रही है। शोचनीय विषय यह है कि सामान्य वर्ग से उसके बचाव का भी अधिकार छीन लिया गया है। बेशक, इससे नक्सलवाद भी बढे़गा। जब निर्दोष होकर भी जेल जाना पड़े तब दफ़ा भी ख़ुद चुनने का अधिकार होता दिखेगा।
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी, प्रयागराज) का कहना है– ऐसी कौन-सी आवश्यकता थी, जो शिक्षाजगत् मे जातीय वैमनस्य फैलानेवाली नियमावली बनानी पड़ी? एक तो वैसे ही आरक्षण की विषम व्यवस्था के चलते, सवर्ण विद्यार्थियोँ मे क्षोभ है, उस पर इस नियमावली ने आग मे घी का काम कर दिया है। शासकीय नियमावली न मानने पर शिक्षण-संस्थानो को दिया जानेवाला अनुदान, सहायता इत्यादिक को रोकने, उन पर आर्थिक दण्ड लागू करने आदिक के नियम से सुस्पष्ट हो जाता है कि सरकार उनपर अपना नियन्त्रण चाहती है। किसी अनुसूचित जाति, जनजाति के व्यक्ति-द्वारा झूठी शिकायत करने पर जिस दण्ड का प्रविधान था, उसे हटाकर और उसमे अन्य पिछड़े-वर्ग को भी जोड़कर सवर्ण को बिना किसी सुनवाई के सीधे जेल मे डालना चाहती है, इससे सरकार किस समानता का संदेश देना चाहती है? सरकार को समतायुक्त शैक्षिक परिवेश की इतनी ही चिन्ता है, तो एक विधेयक लाकर जातिवादिता के फुँफकारते फन को ही क्योँ नहीँ कुचल देती?
सुधीर सागर (सहायक अध्यापक :– एस० बी० एन० इ० कॉ० बाराबंकी) ने कहा– भेदभाव को दूर करने के नाम पर लायी गयी नयी नियमावली अत्यन्त दोषपूर्ण है, जिसमे एक पक्ष को इतनी अधिक स्वतन्त्रता दे दी गयी है कि वह बहुत आराम से व्यक्तिगत दुश्मनी के चलते भी, इसका दुरुपयोग आसानी से कर सकता है, जबकि दूसरे पक्ष को बिना दोषसिद्ध हुए ही जेल जाना पड़ेगा। वह भी उस विद्यार्थी को, जिसका सामाजिक जीवन अभी शुरू ही हुआ है। यू० जी० सी० को ऐसी नियमावली बनानी चाहिए, जिसके अन्तर्गत यदि कोई किसी दूसरे व्यक्ति पर जातिगत टिप्पणी करता है तो उसे दोषसिद्ध होने पर सज़ा मिले। ऐसी नियमावली नहीँ बनानी चाहिए, जिससे किसी जाति-वर्ग को असीमित अधिकार मिल जाये और दूसरे जाति-वर्ग को बिना अपना पक्ष प्रस्तुत किये ही जेल जाना पड़े।