”न्यायतन्त्र को सरकारी शिकंजे मे जकड़ लिया गया है”– न्यायाधीश क ख ग

‘गणतन्त्र-दिवस’ के अवसर पर विशेष प्रस्तुति

प्रयागराज। ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से भारतीय गणतन्त्र-दिवस की पूर्व-संध्या मे एक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसमे देश के प्रतिष्ठित न्यायाधीश, अधिवक्ता एवं अन्य प्रबुद्धजन की सहभागिता रही। परिसंवाद का विषय था– ‘संविधान की मर्यादा के साथ बलप्रयोग क्योँ?’

अपना नाम-उद्घाटन न करने की वचनबद्धता पर प्रयागराज के एक न्यायाधीश ने बताया– आज देश मे जिस तरह से न्यायतन्त्र को सरकारी शिकंजे मे कसकर जकड़ लिया गया है, वह देशहित मे कदापि नहीँ है। मुझे तो आश्चर्य होता है कि अब ज्युडिशियरी मे जिस प्रकार का भ्रष्टाचार पनपने लगा है, उतना इससे पहले कभी नहीँ था। चेहरे, पद-प्रतिष्ठा, पहचान और प्रभाव पर आजकी ज्यूडिशियरी टिकी हुई है। यदि कोई जज ईमानदारी से अपना कर्त्तव्यपालन करता है तो उसे धमकियाँ दी जाती हैँ। सेण्ट्रल और स्टेट की सरकारेँ समूची ज्यूडिशियरी को अपना ग़ुलाम बनाकर रखना चाह रही हैँ; ऐसे मे, न्यायालय मे पारदर्शिता कैसे रहे?

जनपद-न्यायालय, प्रयागराज के अधिवक्ता रमेशकुमार द्विवेदी ने दु:खी मन से बताया–
इस समय न्यायपालिका पूरी तरह सरकार के दबाव में कार्य कर रही है। जैसे जनपद सम्भल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने साक्ष्य के आधार पर कुछ दोषी पुलिसकर्मियों पर एफ० आइ० आर० दर्ज़ करने का आदेश दे दिया था; परन्तु उसकी प्रतिक्रिया मे उन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का तबादला करते हुए, उनका पदवनति भी कर दिया गया। इतना ही नहीँ, पुनः दो दिनो-बाद ही नवनियुक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट का तबादला कर दिया। इस तरह के कृत्य से न्यायपालिका स्वतन्त्र और निष्पक्ष रूप से कैसे कार्य कर सकती है?

पुणे (महाराष्ट्र) की हिन्दी-विदुषी डॉ० नीलम जैन ने कहा– वर्ष १९७३ के केशवानन्द भारती बनाम केरलराज्य-वाद मे उच्चतम न्यायालय के १३ न्यायाधीशोँ की पीठ ने यह ऐतिहासिक निर्णय करते हुए कहा था कि संसद संविधान मे संशोधन तो कर सकती है; किन्तु उसकी मूल संरचना को नहीँ बदल सकती। यह निर्णय इस बात का प्रमाण है कि संविधान की सर्वोच्चता सरकार और संसद पर अंकुश लगाती है। भारत मे न तो केन्द्र-सरकार सर्वोच्च है और न ही राज्य-सरकारेँ। संविधान ही नागरिकोँ के अधिकारोँ की रक्षा करता है और शासन को निरंकुश होने से रोकता भी है।

आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने अपनी चिन्ता व्यक्त की– आज व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका, इन तीनो के अहंकार आपस मे रगड़ खा रहे हैँ, जिससे देश पतन के मार्ग पर लुटता-पिटता दिख रहा है। देश के संविधान की शीर्ष सत्ता रही है; क्योँकि तीनो ही उसी से संचालित होते आ रहे हैँ; मगर इधर, कुछ समय से जिस तरह से केन्द्र और राज्य-सरकारोँ का न्यायपालिका के कार्योँ मे अनावश्यक हस्तक्षेप दिख रहा है, वह देश के स्वास्थ्य के लिए नितान्त घातक रूप मे प्रकट हो चुका है। अब इसे दोनो सरकारोँ को समझना होगा।

उच्चन्यायालय, जबलपुर (मध्यप्रदेश) के अधिवक्ता मो० तौफ़़िक ख़ान मंसूरी ने बताया– न्यायालय की गोपनीयता ख़त्म की जा रही है। समझ मे नहीँ आता कि देश का लोकतन्त्र संविधान से संचालित न होकर, केन्द्र और राज्य की सरकारोँ के इच्छानुसार क्योँ संचालित किया जा रहा है। यह तो एक प्रकार से संविधान के आत्मा का गला घोँटने के समान है। देश के न्यायाधीश भी दो धड़ोँ मे बँटकर रह गये हैँ, जोकि आश्चर्य का विषय है।

प्रत्नकीर्ति प्राच्य शोध-संस्थान के संयुक्त सचिव (शोध), वाराणसी (उत्तरप्रदेश) डॉ० विमलेन्दुकुमार त्रिपाठी का कहना है– भारतीय लोकतन्त्र मे संविधान ही सर्वोपरि है। भारतीय संविधान के अन्तर्गत अनुच्छेद–१ से ५१, जो भारतीय नागरिकोँ तथा अनुच्छेद– 52 के आगे जितने भी अनुच्छेद हैँ, सभी भारतीय शासन-व्यवस्था के अधिकार और कर्त्तव्योँ की स्पष्ट व्याख्या करते हैँ। ऐसी स्थिति मे, भारतीय संविधान के अलावा अन्य कोई विकल्प शेष नहीँ बचता।

उच्चतम न्यायालय, दिल्ली की अधिवक्ता डॉ० रचना बंसल ने कहा– संविधान और शासन का टकराव देशहित मे नहीँ है। सच तो यह है कि सरकार व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका से ही ऑक्सीजन पाती है, इसलिए किसी के न्यायसंगत कार्य मे किसी का हस्तक्षेप देश मे अराजकता का माहौल बना देगा; जैसाकि आज हम देख रहे हैँ। न्यायालय को ‘इविडेंस’ के आधार पर कार्य करने देना चाहिए, अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना चाहिए।