डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
वसंत का प्रारम्भ हो चुका था। आम के वृक्षों पर कोमल बौर आ गया था और हवा में एक मदमस्त सुगन्ध फैलने लगी थी। जीवन में जैसे एक हल्का-सा उल्लास लौट आया था। परन्तु निरंजन के भीतर अभी भी पिछले दिनों की घटनाओं की प्रतिध्वनि चल रही थी। वासुदेव द्वारा भूमि लौटाने के बाद घर में शांति तो आ गई थी, पर उस घटना ने निरंजन के मन में एक गहरी अनुभूति जगा दी थी—धर्म केवल विचार नहीं है, वह जीवन की दिशा है।
उस संध्या वह आँगन में बैठा था। तुलसी के पास दीपक जल चुका था और आकाश में हल्की चाँदनी फैलने लगी थी। उसी समय दरवाज़े के पास फिर वही धीमी दस्तक हुई। निरंजन के मन में एक क्षण के लिए पुरानी स्मृति कौंध गई। जब उसने द्वार खोला, तो सामने वही रहस्यमयी साधु खड़ा था—जटाजूट, शांत मुस्कान और आँखों में वही अद्भुत चमक।
निरंजन ने बिना आश्चर्य प्रकट किए कहा—“आप फिर आ गए।”
साधु हल्के से हँसा। “तुम्हें आश्चर्य नहीं हुआ?”
निरंजन ने शांत स्वर में उत्तर दिया—“जब जीवन परीक्षा लेता है, तो परीक्षक का लौटना स्वाभाविक है।”
साधु कुछ क्षण उसे देखता रहा, जैसे उसकी अंतरात्मा को परख रहा हो।फिर बोला—“तो तुम्हें पता चल गया कि यह सब एक परीक्षा थी?”
निरंजन ने कहा—“हाँ… पर अभी भी एक प्रश्न शेष है।”
“कौन-सा?” साधु ने पूछा।
“क्या यह परीक्षा केवल मेरी थी… या इसके पीछे आचार्य की कोई योजना भी थी?”
साधु की आँखों में एक क्षण के लिए गहरी चमक आई। उसने उत्तर देने से पहले कुछ क्षण मौन रखा। फिर धीरे-धीरे बोला—“तुम्हारे आचार्य साधारण गुरु नहीं हैं। वे केवल उपदेश नहीं देते—वे जीवन को साधक के लिए एक पाठशाला बना देते हैं।”
निरंजन चुप रहा। वह समझ रहा था कि अब कुछ महत्वपूर्ण प्रकट होने वाला है
साधु ने कहा—“तुम्हें लगता है कि वह भूमि का विवाद अचानक हुआ था?”
निरंजन ने कहा—“अब मुझे लगता है कि जीवन में बहुत कम घटनाएँ सचमुच ‘अचानक’ होती हैं।”
साधु मुस्कुराया। “तुम सही दिशा में सोच रहे हो। तुम्हारे आचार्य वर्षों से तुम्हें देख रहे हैं—तुम्हारे विचार, तुम्हारी प्रतिक्रियाएँ, तुम्हारी साधना की गहराई। वे जानते थे कि तुम्हारी साधना अब केवल ध्यान की नहीं रही; उसे जीवन के निर्णयों में उतरना होगा।”
निरंजन ने पूछा—“तो क्या यह सब… उनकी परीक्षा का भाग था?”
साधु ने कहा—“गुरु परीक्षा नहीं लेते, वे केवल परिस्थितियाँ बनने देते हैं। परन्तु हाँ—कभी-कभी वे उन परिस्थितियों को थोड़ा-सा दिशा भी देते हैं।”
कुछ क्षण बाद साधु का स्वर गंभीर हो गया। “परन्तु निरंजन, यह परीक्षा अभी समाप्त नहीं हुई है।”
निरंजन ने शांत भाव से पूछा—“अभी और?”
साधु ने कहा—“अब तक तुम्हारी परीक्षा व्यक्तिगत स्तर पर थी—परिवार, संबंध, आंतरिक संघर्ष। परन्तु अब अगला चरण समाज से जुड़ा होगा।”
निरंजन ने ध्यान से उसकी ओर देखा और कहा “समाज?”
साधु ने सिर हिलाया और कहा “हाँ। क्योंकि जो साधक केवल अपने भीतर शांति पा लेता है, वह अभी अधूरा है। पूर्ण साधना तब होती है जब वह शांति समाज के संघर्षों के बीच भी जीवित रहे।”
साधु उठकर आँगन के बीच आ गया। उसने आकाश की ओर देखा और कहा—“समय बदल रहा है। गाँव में जल्द ही एक ऐसी घटना घटेगी जो लोगों को दो भागों में बाँट देगी—धर्म और स्वार्थ के बीच।”
निरंजन ने पूछा—“और उस समय मुझे क्या करना होगा?”
साधु ने सीधे उत्तर देने की जगह दार्शनिक आलोक मे कहा कि “तुम्हें वही करना होगा जो राम ने किया, जो कृष्ण ने किया—और जो शिव हर युग में करते हैं।”
निरंजन ने पूछा—“और वह क्या है?”
साधु ने गहरी आवाज़ में कहा—“**संतुलन।**धर्म का संतुलन।”
कुछ देर बाद साधु जाने के लिए मुड़ा।
निरंजन ने अचानक पूछा—“क्या मैं आपसे एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ?”
साधु रुका और कहा “पूछो।”
निरंजन ने पूछा कि “आप वास्तव में कौन हैं?”
साधु कुछ क्षण शांत रहा। फिर धीरे से बोला—“यदि मैं कहूँ कि मैं तुम्हारे आचार्य का शिष्य हूँ, तो तुम मुझे एक साधारण व्यक्ति समझोगे। यदि मैं कहूँ कि मैं तुम्हारी साधना का दर्पण हूँ, तो तुम मुझे एक प्रतीक मानोगे और यदि मैं कहूँ कि मैं उस चेतना का अंश हूँ जिसे तुम शिव कहते हो… तो शायद तुम मुझे समझ नहीं पाओगे।”
निरंजन मौन रह गया। साधु ने मुस्कुराकर कहा—“इसलिए यह प्रश्न अभी छोड़ दो।”और वह अंधेरे में धीरे-धीरे ओझल हो गया।
उस रात निरंजन देर तक आकाश को देखता रहा। उसके मन में अब भय नहीं था, पर एक गहरी प्रतीक्षा थी। उसे महसूस हो रहा था कि जीवन का अगला अध्याय अधिक कठिन होने वाला है। क्योंकि अब संघर्ष केवल भीतर का नहीं रहेगा—वह समाज के बीच खड़ा होगा और शायद वहीं यह सिद्ध होगा कि उसकी साधना केवल व्यक्तिगत शांति है… या वास्तव में धर्म की शक्ति।