डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
शरद की एक गहरी रात्रि थी। आकाश में बादल छाए हुए थे और हवा में एक विचित्र नमी थी। घर के बाहर पीपल के पत्तों की हल्की सरसराहट सुनाई दे रही थी। निरंजन ध्यान में बैठा था, परंतु उस रात ध्यान की लय बार-बार टूट रही थी।
मन के भीतर जैसे कोई संकेत उठ रहा था—
एक अनाम पूर्वाभास।
अचानक दरवाज़े पर धीमी-सी दस्तक हुई।
रात का तीसरा प्रहर था। इतनी देर से कौन आ सकता है?
निरंजन उठकर दरवाज़े तक पहुँचा। जब उसने द्वार खोला तो सामने एक अजीब-सा व्यक्ति खड़ा था—लंबा, कृशकाय, जटाजूटधारी। उसकी आँखों में असाधारण चमक थी, पर चेहरे पर थकान की रेखाएँ भी स्पष्ट थीं।
उसने धीमे स्वर में कहा—
“क्या यही निरंजन का घर है?”
निरंजन ने उत्तर दिया—
“हाँ, परंतु आप कौन हैं? इस समय…?”
वह व्यक्ति मुस्कुराया।
“नाम से क्या होगा? समझ लो कि मैं तुम्हारी साधना की परीक्षा लेकर आया हूँ।”
निरंजन कुछ क्षण मौन रहा।
फिर उसने गंभीर स्वर में कहा—
“यदि परीक्षा ईश्वर की ओर से है, तो स्वागत है। परंतु यदि यह केवल जिज्ञासा है, तो उसका उत्तर भी मिलेगा—पर भीतर बैठकर।”
वह व्यक्ति भीतर आ गया।
कुछ देर मौन रहा। फिर उसने सीधे प्रश्न किया—
“तुम्हें लगता है कि तुमने शिवत्व को समझ लिया है?”
निरंजन ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“समझ लिया—यह कहना अहंकार होगा। इतना कह सकता हूँ कि उसकी दिशा का आभास हुआ है।”
वह व्यक्ति हँस पड़ा।
“हर साधक यही कहता है। परंतु क्या तुम जानते हो कि साधना का सबसे बड़ा शत्रु कौन है?”
निरंजन ने कहा—
“अहंकार।”
उस व्यक्ति ने सिर हिलाया—
“नहीं।
साधना का सबसे बड़ा शत्रु है— अधूरा विश्वास।”
उसकी आँखों में एक अजीब चमक थी।
“और मैं देखना चाहता हूँ कि तुम्हारा विश्वास कितना गहरा है।”
उस रात से निरंजन के जीवन में एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ।
अगले दिन वह रहस्यमयी अतिथि अभी भी घर में ही था।
सुबह जब निरंजन ध्यान में बैठा, तो उसने अचानक कहा—
“तुम्हारी साधना स्थिर नहीं है।”
निरंजन ने आँखें खोलीं।
“क्यों?”
वह बोला—
“क्योंकि तुम्हारा मन परिस्थितियों के अनुसार बदलता है। जब सब ठीक होता है, तब तुम शांत रहते हो। पर जब संकट आता है, तब तुम्हारे भीतर प्रश्न उठते हैं।”
निरंजन ने गंभीरता से उत्तर दिया—
“प्रश्न उठना गलत नहीं है। प्रश्न ही हमें गहराई तक ले जाते हैं।”
वह व्यक्ति बोला—
“परंतु साधना का एक स्तर ऐसा भी है जहाँ प्रश्न समाप्त हो जाते हैं—और केवल अटलता बचती है।”
फिर उसने कहा—
“क्या तुम ध्रुव की कथा जानते हो?”
निरंजन ने उत्तर दिया—
“हाँ। पाँच वर्ष का बालक, जिसने अपमान के बाद भी भगवान को पाने का संकल्प लिया और ध्रुव तारा बन गया।”
वह व्यक्ति बोला—
“उस कथा का सार क्या है?”
निरंजन कुछ देर सोचता रहा। फिर बोला—
“अटलता।”
वह मुस्कुराया।
“सही।
साधना में सबसे बड़ी शक्ति ज्ञान नहीं, अटलता है।
ध्रुव को वेद नहीं आते थे। उसे दर्शन नहीं पता था। पर उसका संकल्प अडिग था।”
उसने आगे कहा—
“यदि तुम्हारी साधना ध्रुव की तरह स्थिर नहीं है, तो जीवन की आँधियाँ तुम्हें डिगा देंगी।”
निरंजन ने दृढ़ स्वर में कहा—
“तो मुझे वही अटलता सीखनी होगी।”
वह व्यक्ति पहली बार संतुष्ट दिखा।
कुछ दिनों बाद उस रहस्यमयी व्यक्ति ने एक और प्रश्न किया—
“निरंजन, यदि संसार तुम्हारे विश्वास का उपहास करे तो?”
निरंजन ने उत्तर दिया—
“तो भी विश्वास बना रहना चाहिए।”
वह बोला—
“कहना आसान है। पर जब पूरा संसार विरोध करे तब?”
फिर उसने प्रह्लाद की कथा सुनाई।
“एक बालक जिसने अपने पिता तक का विरोध सहा, पर अपने विश्वास को नहीं छोड़ा। अग्नि, विष, सर्प—कुछ भी उसे डिगा नहीं पाया।”
फिर उसने तीखी दृष्टि से पूछा—
“यदि तुम्हारे जीवन में भी ऐसी परिस्थितियाँ आएँ—जहाँ तुम्हें अपने विश्वास और अपने प्रियजनों में से किसी एक को चुनना पड़े—तब क्या करोगे?”
निरंजन कुछ क्षण मौन रहा।
फिर उसने धीमे पर स्पष्ट स्वर में कहा—
“सच्चा विश्वास किसी का विरोध नहीं करता। वह सत्य के साथ खड़ा रहता है। यदि मुझे चुनना पड़े, तो मैं सत्य के साथ खड़ा रहूँगा—भले ही उसके लिए मुझे अकेला क्यों न होना पड़े।”
उस व्यक्ति की आँखों में एक गहरी चमक उभरी।
एक रात वह व्यक्ति अचानक बोला—
“क्या तुम्हें मृत्यु से भय लगता है?”
निरंजन ने कहा—
“शरीर को लगता है, पर आत्मा को नहीं।”
वह बोला—
“मार्कण्डेय की कथा याद है?”
निरंजन ने सिर हिलाया।
“सोलह वर्ष की आयु में मृत्यु निश्चित थी। पर उसने शिव की आराधना नहीं छोड़ी। जब यमराज आए, तब भी वह शिवलिंग से लिपटा रहा।”
वह व्यक्ति बोला—
“यही निष्ठा है।
जब मृत्यु सामने खड़ी हो और तब भी विश्वास न डिगे।”
फिर उसने धीरे से कहा—
“साधना में भी ऐसे क्षण आते हैं जब सब कुछ समाप्त होता हुआ लगता है—अनुभव, शांति, आशा। तब यदि साधक अपनी निष्ठा बनाए रखे, तो वही क्षण उसे शिव के निकट ले जाता है।”
उस रात निरंजन ध्यान में बैठा था।
अचानक उसके भीतर एक विचित्र अनुभव हुआ। मन में गहरा अंधकार छा गया—जैसे सारी साधना व्यर्थ हो गई हो।
उसे लगा कि वह खाली है।
उसने आँखें खोलीं। वह रहस्यमयी व्यक्ति सामने खड़ा था।
“यही वह क्षण है,” उसने कहा।
“कौन-सा क्षण?” निरंजन ने पूछा।
वह बोला—
“जब साधक को लगता है कि सब समाप्त हो गया है। यही अंतिम परीक्षा है।”
निरंजन ने आँखें बंद कीं और धीरे से कहा—
“यदि सब समाप्त भी हो जाए, तो भी मेरा विश्वास समाप्त नहीं होगा।”
कुछ देर बाद भीतर का अंधकार धीरे-धीरे शांत होने लगा।
प्रभात का समय था।
निरंजन ने देखा कि वह रहस्यमयी व्यक्ति जाने की तैयारी कर रहा है।
“आप कौन हैं?” उसने पूछा।
वह मुस्कुराया।
“मैं कोई व्यक्ति नहीं हूँ। मैं तुम्हारी साधना का दर्पण हूँ।”
निरंजन कुछ समझ नहीं पाया।
वह बोला—
“ध्रुव की अटलता, प्रह्लाद का विश्वास और मार्कण्डेय की निष्ठा—ये तीनों तुम्हारे भीतर ही हैं। मैं केवल उन्हें जगाने आया था।”
फिर उसने जाते-जाते कहा—
“अब तुम्हारी साधना अगले चरण में प्रवेश करेगी और वह धीरे-धीरे दूर चला गया। निरंजन उसे देखता रहा।
उसके भीतर अब एक नई शांति थी—पर इस बार वह शांति अधिक गहरी, अधिक स्थिर थी।
उसे लगा कि अब साधना केवल अभ्यास नहीं रही। अब वह स्वभाव बन रही है।