– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक–
पछुआ मन घायल करे, पुरुआ करे उदास।
झरते पत्ते शाख से, कोई आस-न-पास।।
दो–
देश लगे पतझर यहाँ, कोई हाल-न-चाल।
मौसम निर्मम इस तरह, खीँच रहे सब खाल।।
तीन–
पंख घृणा फैला दिखे, करे कष्ट संवाद।
मानव-मानव दूर है, खेले खेल विवाद।।
चार–
संकट मे हैँ सब दिखेँ, लिये मुखौटा मौन।
चुप्पी घातक बन चुकी, प्रश्न करेगा कौन?
पाँच–
विकट प्रश्न है आजका, उत्तर गह्वर लीन।
सर्पदोष तनकर खड़ा, कौन बजाये बीन?
छ: –
ठगी-ठगी लज्जा दिखे, ठौर नहीँ है और।
नख-शिख नंगे हैँ दिखे, करो ग़ौर-पे-ग़ौर।।
सात–
हम-तुम अन्तर बन गये, चहुँ दिशि है अवरोध।
हीन दिखे संवाद है, केवल मन का क्रोध।।
आठ–
आँच उठ रही हर जगह, हर सू दिखे उबाल।
मन की आँखेँ खोल लो, वरना दृश्य कराल।।
नौ–
देश देह-सी दिख रहा, अंग-अंग विषबेल।
जड़ को हैँ सब सीँचते, यही समय का खेल।।
दस–
मूल विषय है– हम कहाँ, कहाँ हमारा बोध?
चिन्ता घर-घर की यही, कौन करेगा शोध?
ग्यारह–
मौन कर्म संताप है, दु:खती है हर राह।
मिलते आँसू-आह हैँ, सहमी-सकुची चाह।।
बारह–
हृदय मिलाता कौन है, अवसर का है खेल।
पटरी पर घातक दिखे, बिनु इंजिन की रेल।।
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