जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद

नयन अयन उस ओर हैं,
जिस ओर मेरे सरकार !
सज़ल नेत्र चातक फिरें,
करत फिरें मेघ तकरार!
वंशी बजी जो श्याम की,
मेघ करने लगे फटकार!
भीगीं लटें जो सजन की,
करें नागिन सी फुफकार!
नयन अलि सम भीगकर,
बने आवाहन के अगवाकर!
कृत्रिम सौंदर्य से मुक्त हो,
कपोल अब धरे रूप साकार!
इतना सब कुछ तो देखकर,
मेरे मन का फैला आकार!
‘प्रेम’ नहि लघुतर शब्द है,
इसका अर्थ है बड़ा अपार!
रे मन सम्यक् ज्ञानार्जन करो,
मत करना तुम प्रेम व्यापार!