“आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का पाण्डित्य धाराप्रवाह था”–विभूति मिश्र

‘ह्वाट्सएप’-माध्यम (कॉन्फ्रेंसिंग) से सारस्वत आयोजन

आचार्य पं॰ पृथ्वीनाथ पाण्डेय, संयोजक

समर्थ साहित्यशिल्पी-आलोचक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने यद्यपि ‘दुबे छपरा’, बलिया में जन्म लिया था और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (वाराणसी), शान्ति निकेतन (कलकत्ता) तथा पंजाब विश्वविद्यालय को अपने कर्मस्थल बनाये थे तथापि इलाहाबाद के साथ उनका अन्योन्याश्रित सम्बन्ध था। उसके बाद भी इलाहाबाद के साहित्यिक परिवेश में न जाने क्या घटा कि आचार्य जी को इलाहाबाद ने विस्मृत कर दिया। उनकी मृत्युतिथि १९ मई के अवसर पर बौद्धिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक तथा सामाजिक मंच ‘सर्जनपीठ’ की ओर से एक ‘ह्वाट्सएप’ सारस्वत आयोजन किया गया था, जिसमें विषय-विशेषज्ञों की प्रभावकारी भागीदारी थी। हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के प्रधानमन्त्री विभूति मिश्र ने बताया, ” साठ के दशक में देश में एक-से-बढ़कर-एक साहित्यकार-आलोचक थे। उनमें आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का विशिष्ट स्थान था। हमारे सम्मेलन में उनका अतीव सम्मान था। उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर सम्मेलन ने उन्हें ‘साहित्यवाचस्पति’ उपाधि से सम्मानित किया था। उनका पाण्डित्य धाराप्रवाह था और विचार सारगर्भित होते थे।”

विभूति मिश्र

श्यामा प्रसाद मुखर्जी राजकीय महाविद्यालय, फाफामऊ, प्रयागराज में हिन्दी की असिस्टेण्ट प्रोफ़ेसर डॉ० कंचन यादव ने कहा, ”आचार्य का समस्त चिन्तन मानव-केन्द्रित है। उनका इतिहास-दर्शन इसी मानवतावादी चिन्तन पर आधारित है। सांस्कृतिक परम्परा का मूल्यांकन उनकी समग्र साहित्य-साधना की केन्द्रवर्ती प्राणधारा है और इतिहास मनुष्य की जययात्रा की विकासगाथा।”

डॉ॰ कंचन यादव

श्यामा प्रसाद मुखर्जी राजकीय महाविद्यालय में एम०ए० (हिन्दी), चतुर्थ सेमेस्टर की छात्रा आकांक्षा मिश्र का मत है, ” आचार्य द्विवेदी जी के निबन्धों में भावमयता, एकसूत्रता, अनौपचारिकता, स्वच्छन्दवादिता आदिक की विविध विशेषताओं के दर्शन होते हैं। निस्सन्देह, वैसी सरलता, रोचकता, सामाजिक भावों-जैसी निश्छल अभिव्यंजना द्विवेदी जी के निबन्धों में लक्षित होती है, वैसी अन्यत्र दुर्लभ है।”

आकांक्षा मिश्र

परिसंवाद-संयोजक भाषाविद्-समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने विचार व्यक्त करते हुए कहा,” पण्डित द्विवेदी जी के उपन्यासों में भारतीय गद्यकथा और पाश्चात्य उपन्यास-शैली का अत्यन्त मनोहारी और सफल समन्वय दिखायी देता है। वे कोई सामान्य कथाकार नहीं हैं। वे हज़ारों सालों की परम्पराओं को ललकार सकते हैं। ‘बाणभट्ट’ नामक आत्मकथा में वे एक पात्र से कहलवाते हैं,”सत्य के लिए किसी से न डरना, गुरु से भी नहीं, मन्त्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।”

अन्त में, संयोजक ने समस्त सहभागियों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की थी।