मन से मन की
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• मेरी अनहद१ बाँसुरीप्रलय की धुन सुनाती है।कातर२ आँखें,जन-जीवन से पृथक्दृष्टि-अनुलेपन३ करती हैं,काल के कपोलों पर।मुझ पर दृष्टि चुभोती,विहँसती, अल्हड़ गौरैयापंख झाड़, फुर्र हो जाती है।मेरे मन को तलाश↑ है,एक निस्तब्ध४-निस्पन्द५नीरव६-निभृत […]